हत्याओं की मीडिया ट्रायल के बाद मुआवज़े और नौकरियों की मांग और पूर्ती।

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देश में जब भी किसी हत्या को मीडिया में हाइप मिलता है, या उसका मीडिया ट्रायल चलता है तो पीड़ित आगे होकर सरकार से बड़े मुआवज़े और नौकरियों की मांग करते देखे जाते रहे हैं, जैसा कि विवेक तिवारी की हत्या के मामले में देखा जा रहा है।

ये नेताओं की पसंद का खेल है, वो तो चाहते यही हैं कि पीड़ित परिवार उन्हें आवाज़ें दे उन्हें बुलाये, उनसे कुछ मांगे, इससे उनके चिर परिचित ‘संवदेना और मुआवज़ा टूरिज़्म’ को खाद पानी ही मिलता है, नेता लोग मीडिया कैमरों के साथ चेक और नौकरी का अपॉइंटमेंट लेकर पीड़ितों के घर पहुँचते हैं और विजयी मुस्कान के साथ उनका ये कर्तव्य पूरा कर आते हैं।

ऐसे हर दुखद मामले में पीड़ित का दुख, परिस्थितियां और प्राथमिकताएं केवल पीड़ित ही बेहतर समझ सकता है, आप, हम, मीडिया और सियासत तो अनुमान ही लगा सकती है। दो दिन से विवेक तिवारी की हत्या से पूरा देश सन्न है और आक्रोशित भी है, सभी उनके परिवार के शोक में दिल से शामिल हैं, विवेक तिवारी की पत्नी ने भी ठीक इसी तरह सीएम योगी को चिट्ठी भेजकर सीबीआई जांच, पुलिस विभाग में नौकरी और एक करोड़ रुपये मुआवजे की मांग की थी।

अब खबर है कि विवेक तिवारी के परिवार को उत्तर प्रदेश सरकार ने 25 लाख रुपए की आर्थिक सहायता व पत्नी को नगर निगम में नौकरी देने की घोषणा की है

ऐसे मामलों में इस तरह की बातें बिलकुल भी नई नहीं है, ठीक ऐसी ही बात हमें डीएसपी जियाउल हक़ की मार्च 2013 में हत्या के बाद देखने को मिली थी जब उनकी पत्नी परवीन आजाद ने मुआवज़े और नौकरी की मांग रखी थी, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जियाउल की पत्नी परवीन एवं पिता को 25-25 लाख रुपये के दो चेक दिए थे।

और साथ ही में तत्कालीन सरकार में शहरी विकास मंत्री रहे आजम खां व डीजीपी एसी शर्मा की उपस्थिति में परवीन आजाद द्वारा की गई मांगों को स्वीकार करते हुए परिवार के पांच सदस्यों को योग्यता के अनुरूप सरकारी नौकरी देने का आश्वासन दिया था।

इसके बाद अखिलेश सरकार ने परवीन को ओएसडी और जियाउल के भाई सोहराब को आरक्षी वेलफेयर के पद पर तैनाती दी। इस पर परवीन ने कहा कि उन्हें डीएसपी के अलावा कोई और पद स्वीकार नहीं है।

बाद में यह पता चलने पर कि डीएसपी के पद पर सीधी नियुक्ति लोकसेवा आयोग से हो सकती है, परवीन ओएसडी पद पर कार्य करने को तैयार हो गयीं और डीजीपी कार्यालय पहुंच कर कार्यभार ग्रहण कर लिया था।

संवदनाओं और मुआवज़ों के लेन-देन की ये परिपाटी नयी बिलकुल नहीं है, पीड़ित परिवार की प्राथमिकता रहती है कि उनके सियासी रहनुमा आकर उन्हें पूछें दुःख बाँटें, और उनकी हुई हानि की भरपाई करें, और नेता इस ताक में रहते ही हैं कि संवेदना और मुआवज़े का मरहम लगा कर हत्या के इस मीडिया ट्रायल के प्रेशर कुकर की सीटी को थोड़ा उठाकर प्रेशर रिलीज़ कर चिंता मुक्त हो जाएँ।

अपराधियों को सज़ा ? मुआवज़े और नौकरियों के बाद इसकी ख़बरें न तो मीडिया में देखने को मिलती हैं ना ही पीड़ित परिवार बार बार मीडिया के सामने आकर जाँच या कार्रवाही की मांग करता देखा गया है।

इसी लिए तो कहा गया है कि ‘संवदेना और मुआवज़ा टूरिज्म सियासत’ का दो धारी कारनामा है जिसमें नेताओं को विशेष महारथ हासिल हो गयी है, और पीड़ितों के लिए यही ‘संवदेना और मुआवज़ा’ मजबूरी या प्राथमिकता है जिसे वही बेहतर समझ सकते हैं।

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