गाय द्वारा ऑक्सीजन छोड़ने, मोर के आंसू से लेकर बतख वाली ऑक्सीजन तक.

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इन तीन चार वर्षों में विचित्र बयानों की श्रंखला चली है वो शायद सत्तर सालों में नहीं सुनी गयी, कुछ महीनों पहले ही एक राजस्स्थान के भाजपा मंत्री महोदय का बयान आया था जिसमें उन्होंने दावा किया था कि गाय ही पृथ्वी पर एक ऐसा प्राणी है जो ऑक्सीजन लेकर ऑक्सीजन ही छोड़ता है, और तो और देश का गोदी मीडिया भी इस दलील को सच साबित करने के लिए टूट पड़ा था, उनके इस दावे से अमरीका तक के वैज्ञानिक घबरा गए थे, बाद में उन लोगों ने इस पर रिसर्च की तथा ये सच बताया कि गाय की डकार मीथेन गैस छोड़ती है न कि ऑक्सीजन.

BBC   में प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया था कि “इंसानों की तरह गायों को भी पेट के गैस की समस्या होती है. और उनकी डकार से जितनी हानिकारक गैसें निकलती हैं उतनी हानिकारक गैस किसी कार से भी नहीं निकलती है.”

पृथ्वी के वायुमंडल में मीथेन की ज्यादा मात्रा के लिए गायों की डकार से निकलने वाली गैस को लंबे समय से जिम्मेदार माना जा रहा है. कहा गया कि इससे वायुमंडल को नुकसान पहुंचता है.”

उसके बाद राजस्थान हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश महोदय ने दलील दी थी मोरनी मोर के आंसू को पीकर गर्भ धारण करती है. बह्मचारी होने की वजह से मोर को राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा दिया गया है.

इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर लोगों का कई दिनों तक मनोरंजन हुआ था.

इसके बाद विप्लव देव जी ने ये दावा किया है कि बतखों के तैरने से पानी में ऑक्सीजन बढ़ती है. उन्होंने कहा की जब किसी जलाशय में बतख तैरती हैं तो रि-साइक्लिंग की प्रक्रिया होती है और इससे ऑक्सीजन बढ़ता है.

जहाँ एक ओर अमरीका के वैज्ञानिकों ने HARP जैसे मारक हथियार तैयार कर न सिर्फ दुनिया को चौंका दिया है बल्कि पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है, क्रायोजेनिक्स पर गहन रिसर्च चल रहा है, एक ही तारे की परिक्रमा करते धरती के आकार के कम-से-कम सात ग्रहों को खोज निकाला है, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की मोलिक्यूलर बायोलोजी प्रयोगशाला में मानव की चमड़ी से मानव का मस्तिष्क बनाने की कोशिश की जा रही है,वहीँ भारत में गाय, गोबर, गौमूत्र, मोर के आंसू और बतखों द्वारा ऑक्सीजन उत्सर्जन से आगे बढ़ने को तैयार नहीं है.

कुल मिलाकर लगता तो नहीं कि ‘न्यू इंडिया’ के इस हास्यास्पद बयानों और विचारधाराओं के बाद भारत को विश्वगुरु का दर्जा मिल सकता है, ये अलग बात है कि सोशल मीडिया यूज़र्स को मनोरंजन का मसाला ज़रूर मिल जाता है. और विदेश वैज्ञानिकों को खुलकर हंसने का मौक़ा.

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