हम भी देखेंगे कि ‘लाज़िम है कि हम भी देखेंगे’ हिन्दू विरोधी तो नहीं : IIT कानपुर।

CAA के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के चलते 17 दिसंबर को IIT कानपुर के छात्रों ने दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों के खिलाफ हुई पुलिसिया बर्बरता के विरोध में उनके साथ एकजुटता दिखाने के लिए केम्पस के अंदर एक शांतिपूर्ण मार्च निकाला था। इस मार्च में उन्होंने फ़ैज़ का यह मशहूर तराना ‘लाज़िम है कि हम भी देखेंगे’ गाया था।

Deccan Herald की खबर के अनुसार इसके बाद IIT कानपुर से जुड़े लोगों ने आपत्ति दर्जा कराते हुए शिकायत की जिस पर जांच बिठा दी गई है, शिकायत तीन बिंदुओं पर की गयी है, पहली ये कि धारा 144 तोड़कर जुलूस निकालना, दूसरा सोशल मीडिया पर CAA को लेकर की गई छात्रों की पोस्ट और तीसरी ये कि क्या फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म हिंदू विरोधी है।

IIT कानपुर के कुछ प्रोफेसर्स के अलावा 15 छात्रों ने भी प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ शिकायत पर हस्ताक्षर किए हैं। वहीँ IIT कानपूर के डिप्टी डायरेक्टर मनींद्र अग्रवाल ने भी बाद में आपत्ति जताते हुए कहा, “वीडियो में छात्र फैज़ कविता का पाठ करते नज़र आ रहे हैं, जिसे हिंदू विरोधी भी माना जा सकता है।”

फैज अहमद फैज ने यह नज़्म 1979 में पाकिस्तान के फ़ौजी तानाशाह ज़ियाउल हक की सत्ता के खिलाफ लिखी थी, मशहूर पाकिस्तानी गायिका इक़बाल बानो ने ज़ियाउल हक के मार्शल लॉ को चुनौती देने के लिए लाहौर में 50,000 दर्शकों के सामने यह नज़्म गाई थी।

फैज़ उर्दू के वह महान शायर हैं जिनका नाम साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित हुआ था। उनकी क्रांतिकारी शायरी के लिए पाकिस्तानी शासकों ने उन्हें सालों तक जेल में बंद रखा था।

शिकायत नज़्म की इन दो लाइनों पर :

जब अर्ज़े खुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे।

आधारित थी, जिसे स्पष्ट रूप से आपत्तिजनक बताया गया है, उनके अनुसार इसका मतलब होता है कि “जब सभी मूर्तियों को हटा दिया जाएगा, केवल अल्लाह का नाम रहेगा।”

जबकि उनकी नज़्म इस तरह से है :

हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे,
वो दिन कि जिसका वादा है,
जब अर्ज़े खुदा के काबे से,
सब बुत उठवाए जाएंगे,
हम अहले सफा मरदूदे हरम,
मसनद पे बिठाए जाएंगे,
सब ताज उछाले जाएंगे,
सब तख्त गिराए जाएंगे।

यहाँ बुतों से तात्पर्य अल्लाह की ज़मीन पर सैनिक तानाशाह और उसके सैनिकों से है, तनाशाह के ताज और तख़्त उछालने से और शोषितों व आमजन की सरकार से है।

IIT कानपुर के छात्र मीडिया पोर्टल पर प्रकाशित एक लेख में छात्रों ने उल्लेख किया है कि यह साफ़ है कि विरोध प्रदर्शन के दिन क्या हुआ था, कुछ लोगों ने फैज़ की नज़्म के प्रतीकों को धर्म से जोड़कर उसे हिंदू-मुस्लिम और भ्रामक’ मोड़ दे दिया। IIT के छात्रों ने ये भी आरोप लगाया था कि सांप्रदायिक सामग्री अपलोड करने का आरोप लगाकर सोशल नेटवर्किंग साइट पर रोक लगा दी गई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close