मणिपुर राज्य ने पहला ‘एंटी मॉब लिंचिंग’ क़ानून पास कर मिसाल पेश की।

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देश में मॉब लिंचिंग के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं, बुलंदशहर में भीड़ द्वारा शहीद कर दिए गए सुबोधकुमार सिंह के बाद भीड़ ने गाजीपुर में एक पुलिस कांस्टेबल सुरेश वत्स की पीट पीट कर हत्या कर डाली तो दूसरी ओर राजस्थान के अलवर में भी गौरक्षक गुंडों ने सगीर खान नमक युवक को बुरी तरह से पीट डाला।

भीड़ की हिंसा (Mob Lynching) को रोकने के लिए राजनैतिक दल और सम्बंधित राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी कोई ठोस कार्य योजना या क़ानून नहीं बना पायी हैं, यहाँ तक कि कई मामलों में पीड़ितों को ही अपराधी घोषित कर दिया है तो वहीँ मणिपुर विधानसभा ने देश का पहला एंटी मॉब वायलेंस बिल पास कर देश में एक उदाहरण पेश किया है। इसमें कहा गया है कि पीड़ित की मौत पर हिंसा में शामिल लोगों को आजीवन कारावास की कठोर सजा सुनाई जायेगी।

Times of India की खबर के अनुसार मणिपुर राज्य विधानसभा में ‘द मणिपुर प्रोटेक्शन फ्रॉम मॉब वायलेंस बिल, 2018’ को विधानसभा ने सर्वसम्मति से पारित कर दिया है। मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने विधानसभा में ‘‘मणिपुर भीड़ हिंसा से संरक्षण विधेयक, 2018’’ सदन के पटल पर रखा। जिसके बाद सदन ने इसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया।

ज्ञात रहे कि सितम्बर 2018 को मणिपुर में मणिपुर में बाइक चोरी के शक में 26 साल के एमबीए छात्र फारूक अहमद खान की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी, इधर गत वर्षों में भाजपा शासित राज्यों में गौरक्षा, गौ तस्करी, गोकशी और बच्चे चोरी करने की अफवाहों के चलते मॉब लिंचिंग में कई लोग भीड़ द्वारा पीट पीट कर मार डाले गए, इनमें से अधिकांश पीड़ित मुस्लिम, दलित और निर्धन श्रेणी के लोग शामिल थे।

अब जबकि मणिपुर ने भीड़ की हिंसा के विरुद्ध कठोर क़ानून पास कर देश में एक उदाहरण पेश किया है तो मॉब लिंचिंग से प्रभावित राज्यों और सरकारों का भी कर्तव्य बनता है कि ऐसा ही कठोर क़ानून पास कर इस हिंसक भीड़ पर लगाम लगाई जाए ताकि निर्दोष लोग बेमौत न मारे जाएँ।

 

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