बहुत ज़्यादा नहीं बल्कि थोड़ा सा ही पीछे चलते हैं, सिर्फ मई 2014 तक लौटते हैं, और उस वक़्त से पहले के हिंदुस्तान को देखते हैं, पाकिस्तान तब मुर्दाबाद नहीं था, कैसे ? उसे इस तरह समझिये ज़ी न्यूज़ के मालिक और भाजपा समर्थित राज्यसभा प्रत्याशी सुभाष चंद्रा के एक चैनल ज़ी ज़िन्दगी पर तब केवल पाकिस्तानी धाराहिक ही आते थे, ज़िन्दगी गुलज़ार है से उसे ख़ास पहचान मिली थी।

सोनी टीवी पर कॉमेडी शो में पाकिस्तानी कॉमेडियन शकील बिना किसी रुकावट के हिस्सा लेते थे, स्टार नेटवर्क के स्टार वन चैनल पर सिद्धू के साथ मशहूर पाकिस्तानी कॉमेडियन उमर शरीफ ने हिस्सा लिए था, देश की जनता आराम से इन सभी का आनंद लेती थी। पाकिस्तानी अभिनेता फवाद खान सहित कई अभिनेताओं गायकों और अभिनेत्रियों ने बॉलीवुड में भारतीय कलाकारों के साथ काम किया, किसी को कहीं भी किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं थी। भारत पाकिस्तान के बीच देश में क्रिकेट मैच खेले जाते थे, पाकिस्तान जीते ये हिंदुस्तान जीते खुशियां बराबर मनाई जातीं थीं, कोई झगड़ा नहीं होता था।

पाकिस्तानी गायक राहत फतह अली खां, आतिफ असलम के गाने ग़ज़लें लोग गुनगुनाते थे, पाकिस्तानी ग़ज़ल गायक गुलाम अली बनारस के मंदिर आकर भजन गया करते थे। रेख्ता में पाकिस्तानी साहित्यकार हिस्सा लेते थे तो उसका गौरव बढ़ जाता था।

कौन क्या खा रहा है, क्या पहन रहा है, क्या पढ़ रहा है, किसके फ्रिज में क्या है, सिनेमा हाल में राष्ट्रगान बजना ज़रूरी नहीं था, किसी को इससे मतलब नहीं था, गाय, हिन्दू मुस्लिम कोई भी खतरे में नहीं था। राष्ट्रवाद तब भी था, सैनिक शहीद होते थे तो इसका बदला लिया जाता था। मगर मनमोहन सिंह कभी बिरयानी खाने पाकिस्तान नहीं गए।

फिर 2014 का चुनाव हुआ और सरकार बदली, धीरे धीरे देश में पाकिस्तान विरोध माहौल बनाया गया, यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि पाकिस्तान मतलब ‘मुसलमान’। इसके लिए तैयारी पूरी थी, मीडिया को क़ब्ज़े में किया गया, जो प्रोपगंडे के लिए सबसे ज़रूरी हथकंडा था, सबसे पहले ज़ी ज़िन्दगी से पाकस्तानी धारावाहिक गायब हुए, उसके बाद कॉमेडी शो से पाकिस्तान कलाकारों का विरोध हुआ। गुलाम अली को बनारस में भजन गाने से रोका गया।

फिर पाकिस्तानी अभिनेताओं, गायकों का विरोध हुआ, साहित्यकारों का विरोध हुआ यहाँ तक कि 12 डिसम्बर 2015 को मुंबई में पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री की किताब के विमोचन के विरोध में शिव सेना ने आडवाणी के करीबी माने जाने वाले सुधींद्र कुलकर्णी के मुंह पर कालिख पोत डाली थी। यहाँ एक खलनायक गढ़ कर खड़ा कर दिया गया ‘पाकिस्तान’।

इसके बाद अगला खलनायक गढ़ा गया ‘कश्मीर’, कश्मीर यानी मुसलमान। इसका सीधा सम्बन्ध पहले गढे गए खलनायक पाकिस्तान से जोड़ा गया, मीडिया के ज़रिये कश्मीरियों को पाकिस्तान परस्त और हर कश्मीरी युवक युवती को पत्थरबाज, सेना विरोधी और देश विरोधी घोषित किया गया, कश्मीर के लिए इनकी ये रणनीति सुनियोजित थी, इसके लिए भाजपा और संघ ने चालाकी से महबूबा मुफ़्ती के साथ मिलकर सरकार बनाई और कश्मीरी तंत्र में घुसपैठ कर जगह बनाई।

महबूबा मुफ़्ती के साथ गठबंधन के दौरान और बाद में भी संघ और भाजपा ने बड़ी तेज़ी से मीडिया के कंधे पर चढ़कर कश्मीर को जल्दी से जल्दी खलनायक के तौर पर पेश करने की कोशिश की, मीडिया ने दिन रात ओवर टाइम कर ‘पत्थरबाजों’ पर ख़बरें खर्च कीं, इस दूसरे खलनायक को खड़ा करने के दौरान और आज से छह महीने पहले तक देश के कई राज्यों में रह रहे कश्मीरी नागरिकों और कश्मीरी स्टूडेंट्स पर कई बार हमले हुए, ये हमले करने वाले अपने आपको राष्टवादी और देशभक्त कहते हैं।

इस दूसरे खलनायक ‘कश्मीर’ को खड़ा करने के बाद क्या क्या हुआ सभी जानते हैं, कश्मीर से धारा 370 को खत्म करने के लिए पहले उसे खलनायक के तौर पर स्थापित करना ज़रूरी था। आज कश्मीर और कश्मीरियों के क्या हाल हैं किसी से छुपे नहीं हैं।

ये दोनों खलनायक खड़े करने के बाद अब बारी थी असल चोट करने की और एक और अहम् और आखरी खलनायक को खड़ा करने की, जो इनके एजेंडों में शामिल था, इसके लिए संघ और भाजपा ने बड़ी चालाकी से ‘गौ माता’ का सहारा लिया, और मांसाहारी ‘मुसलमानों’ को नया खलनायक बनाकर खड़ा कर दिया, नतीजा देश में अचानक से गौ रक्षा के नारे लगने लगे, गौ रक्षक दल बनने लगे, गौ मांस खाने का आरोप लगाकर दादरी के अख़लाक़ की हत्या से इसकी शुरुआत हुई और इस सरकार के पहले कार्यकाल में ही 150 के लगभग लोग मॉब लिंचिंग कर मार डाले गए, जिनमें अधिकांश मुसलमान थे, क्योंकि मार डाले गए खलनायक थे, इसलिए मॉब लिंचिंग करने वालों का भाजपा नेताओं ने फूल मालाओं से स्वागत तक किया।

एक के बाद एक खलनायक गढ़ने में गोदी मीडिया सरकार से दो क़दम आगे चलने लगी, अधिकांश टीवी डिबेट्स में मुसलमानों को खलनायक के तौर पर पेश किया जाने लगा, सरकार विरोध या असहमत होने वालों को देशद्रोही घोषित किया जाने लगा, वन्दे मातरम, भारत माता की जय और जयश्री राम के नारे नहीं लगाने वालों (मुसलमान) को देश से चले जाने की धौंस खुले आम भाजपा और संघ नेता देने लगे।

इस्लामोफोबिया के फूहड़ संस्करण को काम में लिया जाने लगा, सोशल मीडिया इसके लिए घातक हथियर के तौर पर इस्तेमाल किया गया, मुसलमानों के खिलाफ हेट स्पीच नफरत के ज़हर का बोलबाला हो गया, ट्वीटर हो या फेसबुक या फिर व्हाट्सएप हर जगह आखिरी खलनायक ‘मुसलमान’ निशाने पर लिया जाने लगा।

सरकार से असहमत या विरोधी होने पर पाकिस्तान भेजे जाने की धौंस दी जाने लगी, बहु संख्यकों को 14 फ़ीसदी मुसलमानों की बढ़ती आबादी का झूठा भय दिखाया गया, अब दूसरे कार्यकाल में गोदी मीडिया भी खुलकर नंगी हो गई और इस हेट एजेंडे में शामिल होकर मुसलमानों पर गुर्राने लगी। मुसलमानों के अलावा सरकार जो असहमत नहीं थे या और मुद्दों विरोध में थे, उनके लिए ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’, शब्द ईजाद किया गया, बुद्धि जीवियों के लिए ‘अर्बन नक्सल’ शब्द लाया गया और इन्हे भी बाक़ी गढ़े गए खलनायकों की लाइन में खड़ा कर दिया गया, यानी सरकार के दुश्मन और देश के दुशमन।

देश के हर चुनाव में भाजपा खुद को भारत और विरोधियों को पाकिस्तानी प्रोजेक्ट करने लगी, वोट भी इसी तर्ज़ पर मांगे जाने लगे कि ‘किसकी जीत पर पाक में पटाखे फूटेंगे ?’ जैसे कि हाल ही में कपिल मिश्रा ने चुनाव के दिन को भारत और पाकिस्तान के बीच का मुकाबला बताया था।

इसके बाद ये लोग अपने असल रंग में आ गए, और इनके मुंह से निकला “गोली मारो सालों को !” ताज़ा दिल्ली चुनाव इनके इसी खलनायक गढ़े जाने और जनता को एक के बाद एक खलनायक दिखाकर ब्रेन वाश करके सत्ता हासिल करने की कोशिश करने का बड़ा उदाहरण है।

गोली मारो नारे को भी स्वीकार्यता दिलाई गई, कपिल मिश्रा हो या फिर अनुराग ठाकुर, इनके खिलाफ केस दर्ज तो हुए मगर ना तो पुलिस ने इन्हे गिरफ्तार किया और ना ही भाजपा ने इनके खिलाफ किसी तरह की कोई कार्रवाही की। इसी बीच मोदी सरकार CAA-NRC और NPR लेकर आई, और इसी के विरोध में देश भर में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए और फिर शाहीन बाग़ बनकर खड़ा हुआ।

भाजपा और संघ ने खलनायक खड़ा करने का फिर वही प्रोपैगैंडा काम में लिया, नफरत में अंधे हुए ब्रेन वाश लोगों द्वारा पिछले तीन खलनायकों की स्वीकार्यता के चलते शाहीन बाग़ को भी खलनायक बनाकर खड़ा कर दिया गया, गोदी मीडिया ने इसमें उत्साह से साथ दिया, न्यूज़ चैनल्स के एंकर्स ने शाहीन बाग़ को खलनायक बनाने में एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया, दूसरे छोर पर कपिल मिश्रा और अनुराग ठाकुर जैसे लोग खुले आम देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों के नारे लगाते रहे, खुद देश के गृह मंत्री ने दिल्ली के मतदाताओं से आग्रह किया था कि ईवीएम का बटन इतनी ज़ोर से दबाना कि करंट शाहीन बाग़ में लगे।

नतीजा ये हुआ कि जामिया के CAA-NRC और NPR विरोधी प्रदर्शनों में एक युवक पिस्तौल लेकर स्टूडेंट्स के सामने खड़ा हो गया, उसके बाद शाहीन बाग़ में कपिल गुजर नाम के एक युवक ने पिस्तौल से हवाई फायर कर डाले थे।

और सबसे आखिर में आते हैं कल दिल्ली के भजनपुरा में हुए दंगे की, ऊपर एक के बाद एक प्रोपगंडे और एजेंडे को पढ़ते हुए समझ जायेंगे कि किस तरह से भाजपा के एक हारे हुए नेता कपिल मिश्रा ने मीडिया के सामने मौजपुर चक्का जाम खुलवाने के लिए खुले आम धमकियाँ दीं थीं, साथ ही टवीटर पर लोगों से इसके लिए आह्वान भी किया था।

और नतीजा दिल्ली का दंगा सामने है, मीडिया के अनुसार कुल चार मौते हुई हैं जिसमें एक हेड कांस्टेबल भी शामिल है।

मई 2014 से लेकर आज तक चल रहे इस घृणित इस्लामॉफ़ोबिक प्रोपगंडे ने हिंदुस्तानी मुसलमानों को एक तरह से इस देश पर एक बोझ, भयानक, पाकिस्तान परस्त, देशद्रोही, हिन्दू विरोधी और गैर ज़रूरी भीड़ के फ्रेम में जड़ दिया है।

इस्लामोफोबिया के बोये बीजों की फसल काटते काटते इन लोगों ने देश में नफरत का लिजलिजा कीचड फैला डाला है, जो देश मई 2014 से पहले हर हाल में मस्त और संतुष्ट था आज सहमा हुआ है, पुलिस का र’वैया हो या फिर राज्य सरकारों का या फिर मीडिया का, हर कोई लाल आँखें किये सुनियोजित षड्यंत्र के तहत गढ़े गए खलनायकों पर गुर्रा रहा है, लोग खून के प्यासे हो रहे हैं, मुहल्लों से धुंवें के साथ लाशें उठ रही हैं।

पता नहीं असली टुकड़े टुकड़े गैंग कौन है, असली अर्बन नक्सल कौन है और असल खलनायक कौन है ?