जिस पीढ़ी के हाथ में किताबें और डिग्रियां होना चाहिए थीं, उस पीढ़ी के हाथ में पत्थर और हथियार किसने दिए ?

जिस पीढ़ी के हाथ में किताबें और डिग्रियां होना चाहिए थीं, उस पीढ़ी के हाथ में पत्थर और हथियार किसने दिए ?
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नेक्स्ट जनरेशन या भावी पीढ़ी उस नस्ल को कहते हैं जो कल देश के भावी नागरिक बनेंगे, अपना मताधिकार पहली बार इस्तेमाल करेंगे, या कर चुके हैं, और देश का भविष्य तय करेगी, वो युवा जिनके लिए हर माँ-बाप यही कोशिश करते हैं कि वो खूब पढ़ लिख कर नैतिक रूप से एक सभ्य नागरिक बने, देश की मुख़्यधारा में अपना योगदान दे।

अधिकांश देशों के लिए ये पीढ़ी एक अमूल्य निधि की तरह मानी जाती है, वो देश इस पीढ़ी को बेहतर भविष्य देना प्राथमिकताओं में रखते हैं। वो प्रारम्भ से ही इन्हे नैतिक शिक्षा के साथ साथ बेहतर ढंग से शिक्षित करने की कोशिश करते हैं, वो इस बात को जानते हैं कि नैतिक रूप से अपने कर्तव्यों को समझने वाली ये शिक्षित पीढ़ी ही कल के बेहतर नागरिक होंगे। जापान, फ़िनलैंड, क्यूबा आदि देश इसकी बड़ी मिसाल है।

हमारे देश में इस पक्ष को देखें तो सब कुछ उल्टा नज़र आता है, जिस पीढ़ी के हाथ में किताबें और डिग्रियां होना चाहिए थीं सियासी भेड़ियों ने उनके हाथ में पत्थर और हथियार दे दिए हैं, नैतिक, मौलिक और सर्व सुलभ शिक्षा से वंचित ये युवा बेरोज़गार पीढ़ी हताश और आक्रोशित है तो उसके इस आक्रोश का दोहन कट्टर धार्मिक संगठन सियासी हितों के लिए करने लगे हैं।

बुलंदशहर में मारा गया सुमीत हो या फिर कासगंज का चन्दन हो या फिर अख़लाक़ के हत्या का आरोपी रवि हो जिसकी जेल में मौत हो गयी थी, या फिर वो सब युवा जो सत्ता की बैसाखियाँ बने इन कट्टर उग्र धार्मिक संगठनों का टूल बनकर सांप्रदायिक हिंसा या बवाल या बेक़ुसूरों की हत्याओं के आरोप में जेलों में बंद हैं या सज़ाएं काट रहे हैं, या विचाराधीन हैं।

ये सब युवा कल के नागरिक थे या हैं, सोचिये ऐसे युवा जिनके हाथ में किताबें होना चाहिए डिग्रियां होना चाहिए थीं वो किस धंधे में लगे हैं और ये कैसे नागरिक बनेंगे ? ‘न्यू इंडिया’ और ‘विश्वगुरु’ बनने का नारा देने वाली सरकार क्या ऐसे युवाओं के दम पर देश को विश्व का गुरु बनाएगी ?

सत्ता लोलुप लोग इस पीढ़ी के साथ कुठाराघात कर रहे हैं इन्हे दोहरी मार मार रहे हैं, एक ओर इन्हे रोज़गार और सर्व सुलभ शिक्षा न देकर हताश और बेरोज़गारों की भीड़ में वृद्धि कर रहे हैं और दूसरी ओर इस हताश भीड़ के आक्रोश का दोहन करने के लिए अपने बगल बच्चे उग्र धार्मिक संगठनों का चारा बनाकर सड़कों पर उत्पात करने के लिए न सिर्फ खुला छोड़ रहे हैं, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप इनका उत्साह वर्धन कर अभयदान भी दे रहे हैं।

देश में आये दिन हो रहे और हो चुके सांप्रदायिक घटनाओं, उत्पातों, मॉब लीचिंग्स पर नज़र डालिये यही पीढ़ी आपको लिप्त मिलेगी, कभी सोचा है कि ऐसी घटनाओं में किसी नेता या उग्र धार्मिक संगठनों के पदाधिकारियों की संतानें क्यों नहीं होतीं ? “मंदिर बलिदान मांग रहा है” जैसे नारे लगाने वाले उग्र धार्मिक संगठनों और सियासी खिलाडियों की औलादें क्यों बलिदान देने आगे नहीं आतीं ?

ये पीढ़ी आस्था, धर्म और राष्ट्रवाद को ढाल बनाकर खेले जा रहे इस शातिर सियासी खेल में चारों ओर से मात खा रही है, ये खुद अपने ही हाथ से न सिर्फ अपना बल्कि अपनी पीढ़ी का भी भविष्य ख़राब कर रही है, साथ ही इस नकारा और हताश पीढ़ी की भीड़ के शिकार लोगों के परिवारों का भी भविष्य ख़राब कर रही है।

इसका बड़ा उदाहरण बुलंदशहर में ऐसे ही बवाल में शहीद हुए इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह के पुत्र को देख कर समझ सकते हैं, अख़लाक़ के पुत्र से लेकर अलवर में ऐसी ही भीड़ द्वारा मार डाले गए रकबर खान की दोनों बेटियों की हालत देख कर समझ सकते हैं, गौरक्षा के नाम पर बोई गयी नफरत के शिकार 24 मुसलमानों के उन परिवारों और उनके बच्चों की हालत देखकर समझ सकते हैं।

सोचिये अगर सड़कों पर तांडव मचाती इस पीढ़ी के हाथ में किताबें और डिग्रियां होतीं तो इनकी ये हताश और आक्रोशित भीड़ सड़कों पर निकल कर ऐसे तांडव न करती तो आज न सिर्फ इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह ज़िंदा होते, बल्कि अख़लाक़ से लेकर रकबर खान तक ज़िंदा होते।

मगर अगर इस पीढ़ी के हाथ में किताबें और डिग्रियां आ जातीं तो शायद इस सियासत का दम घुट चुका होता, इसके शातिर चेहरे पर चढ़ा मुखौटा धज्जियाँ धज्जियाँ होकर फट चुका होता।

काश कि हम और आप अपनी इस नेक्स्ट जनरेशन को इस ज़हरीली सियासत का चारा बनने से बचा लें, ताकि न सिर्फ उसका बल्कि उसकी नेक्स्ट जनरेशन का भी भविष्य सुमीत, चन्दन या रवि जैसा न हो, और ये नेक्स्ट जनरेशन इस देश के लिए सभ्य, शिक्षित और संस्कारी नागरिक बन कर देश का नाम रोशन करे। ये देश तभी सीना तानकर ‘न्यू इंडिया’ और ‘विश्वगुरु’ कहलाने योग्य होगा|

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