लाखों भारतीय विदेश में विभिन्न देशों बसे है, कुछ नागरिकता लिए हुए तो कुछ नौकरी करने अस्थाई तौर पर गए हुए हैं, मेरा निजी अनुभव है कि हम देश और विदेश में भारतीयता को लेकर दोहरा मापदंड अपनाते हैं, इसका एक उदाहरण देना चाहता हूँ , 2005 में मेरे एक मित्र के व्यवसाय के सिलसिले में उसके साथ अफ्रीका के केन्या देश के एक सुदूर शहर मोम्बासा जाना हुआ था, केन्या की राजधानी नैरोबी है।

वहाँ लाखों भारतीय और पाकिस्तानी राज़ी ख़ुशी रहते हैं, भारतियों और पाकिस्तानियों में अधिकांश वो हैं जिनके पुरखे कभी गुजरात वहाँ जाकर बस गए थे, हमारा मोम्बासा से भी आगे जाना हुआ, होटल लेने के बाद एक समस्या आ गयी, लोकल करेंसी ख़त्म होने वाली थी, एयर पोर्ट से अगली फलाइट पकड़ने की जल्दबाज़ी में करेंसी एक्सचेंज कराना भूल गए थे।

इसलिए वहां डालर एक्सचेंज करना ज़रूरी हो गया था..वहाँ सबसे बड़ा संकट मेरे लिए यह खड़ा हुआ कि हम ज़बान नज़र नहीं आया, अधिकांश अफ्रीकी अंग्रेजी नहीं समझ पा रहे थे, उर्दू हिंदी तो दूर की बात थी, उस छोटे क़स्बे में घूमते घूमते आखिर एक अफ्रीकी दूकानदार कुछ अंग्रेजी समझ पाया, उसने मुझे एक होटल का पता बताया, मैं पूछता पूछता उस होटल तक पहुंचा वहाँ काउंटर पर एक भारतीय सी दिखने वाली युवती बैठी हुयी मैं सीधा उसके पास पहुंचा और अभिवादन करके उससे अंग्रेजी में बात करने की शुरुआत की।

सबसे बड़ी बात यह कि विदेश में यदि आप कभी ऐसी जगह फंस जाएँ जहाँ कोई आपकी या माध्यम भाषा को जानने वाला नहीं हो तो संकट खड़ा हो जाता है, हर बात के लिए अपने आप को असहाय महसूस करते हैं।

मैंने उसे बताया कि मैं भारत से आया हूँ, और जल्दी में करेंसी एक्सचेंज कराना भूल गया, मुझे 500 डालर के बदले केन्याई शिलिंग चाहिए, जैसे ही उसे पता चला कि मैं भारत से आया हूँ, उसने मुझसे हिंदी में कहा कि मैं भी भारत से ही हूँ, उसके बाद उसने अपने पिताजी को अंदर से बुलाया और मेरा परिचय कराया। वो एक गुजराती हिन्दू परिवार से थे, उनके परदादा के दादा कभी गुजरात से यहाँ आये थे, और फिर यही बस गए।

उसके पिताजी मुझे अंदर सादर केबिन में ले गए और चाय आदि मंगवाने के बाद मुझसे खूब बातें की, उन्होंने मेरे डालर केन्याई शिलिंग में बदले और मुझसे कहा कि आप किस्मत वाले हैं कि सही जगह आये हैं, यहाँ डालर के बदले नक़ली केन्याई शिलिंग देने वाले गेंग सक्रीय हैं, आप को यहाँ की करेंसी की पहचान भी नहीं है, कई लोग ठगे जा चुके हैं।

उन्होंने उस शहर के बारे में मुझे और भी कई तरह की हिदायत दी जो कि आगे मेरे काम आयी, जाते समय उन्होंने कहा कि यहाँ यदि आपको कोई भी परेशानी हो तो मुझसे फोन पर संपर्क कर लीजिये, अपने देश से इतनी दूर अपने देशवासी और हमज़बान मिल जाएँ और इतना अपनापन मिल जाए तो अपार ख़ुशी होती है।

इसके बाद मेरा एक गुजराती मुस्लिम नवाब खान से मिलना हुआ, उनके पुरखे भी गुजरात से वहाँ आकर यही बस गए थे, वो न सिर्फ केन्या के नागरिक थे बल्कि उन्हें ब्रिटिश पासपोर्ट भी मिला हुआ था, वहां के एक हिंदुस्तानी होने के नाते वो मुझसे मिलकर बहुत ही खुश हुए और उन्होंने अपने घर में दावत दी और कुछ स्थान घुमाये, एक दिन उनके साथ गुज़ारा जो अभी तक याद है।

नवाब भाई ने वहाँ ही बसे पाकिस्तानी परिवार की लड़की से शादी कर ली थी, इसलिए हिंदी उर्दू का संगम था उनकी ज़बान में, दो बेटियां थीं, स्कूल में पढ़ती थी, मगर हिंदी ना के बराबर बोल या समझ पाती थी, उर्दू पढ़ना और बोलना आती थी, मगर अंग्रेजी या स्थानीय भाषा में प्रवीण थीं, यहाँ मुझे उनके घर में हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी और केन्याई तीनों संस्कृतियों का अद्भुत संगम नज़र आया।

यहाँ मैं मूल बात पर आ जाता हूँ, सऊदी अरब में भी कुछ समय मैंने काम किया है, मगर वहाँ यह भाषायी समस्या बिलकुल नहीं के बराबर है, वहाँ हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी बड़ी तादाद में मौजूद हैं, जो कि एक दूसरे की ज़बान बखूबी समझ सकते हैं। यहाँ तक कि वहाँ के शेख भी अब हिंदी बोलते नज़र आते हैं, यहाँ भी सभी राज्यों और धर्मो के हिंदुस्तानी भाई मिल जुल कर रहते और काम करते हैं, यहाँ तक कि पाकिस्तानी भी यहाँ भाषाई समानता के कारण एक साथ रहते, खाते पीते और उठते बैठते हैं।

जब हम विदेश में होते हैं तो वहाँ परदेस में हमारे लिए हमारे देश वासी न कोई हिन्दू होता है, न कोई मुस्लिम, न सिख न ही ईसाई, न मलयाली होता है, न कोई कश्मीरी न कोई गुजराती न कोई यूपी वाला न बिहार वाला और ना ही आमची मुंबई वाला…वहाँ यह सब केवल हिंदुस्तानी होते हैं, और हम उन्हें देखते भी उसी दृष्टि से ही हैं। यहाँ तक कि अगर कोई विदेशी अपनी भाषा बोलने वाला भी मिल जाए तो उससे भावनात्मक तौर पर लगाव हो जाता है, वो अपना सा लगने लगता है।

मगर जैसे ही हम अपने देश लौटते हैं, हमारी सोच में बदलाव शुरू होने लगता है, हम यहाँ आकर सबसे पहले राजस्थानी, मराठी, गुजराती, मलयाली जैसे खानो में बँटते नज़र आने लगते हैं। न सिर्फ आप बल्कि यहाँ के लोग भी पुलिस, कस्टम से लेकर टेक्सियों तक और ट्रेन से लेकर बसों तक पूछ ताछ में इस बात को ज़ाहिर कर ही देते हैं।

उसके बाद फिर आप हिन्दू , मुस्लिम सिख ईसाई वाले खानो में बँटने लगते हैं, शहर में आते आते ब्राह्मण, कायस्थ, पठान, कुरैशी, राजपूत ST ..SC जैसे स्थानीय कई खानो में बँट जाते हैं। यहाँ फिर से आपकी सोच अपने माप दंड स्वत: ही बदल चुकी होती है।

परदेस में जहाँ हमारे लिए हर धर्म और राज्य का देश वासी सिर्फ और सिर्फ एक हिंदुस्तानी होता है, यहाँ आकर उसके कई हिस्से हो जाते हैं, यहाँ बेशक वो हिंदुस्तानी तो है, मगर पहले वो हिन्दू है, मुस्लिम है, ईसाई है सिख है, मराठी है, मलयाली है, गुजराती है, बिहारी है, यूपी वाला है, पूर्वोत्तर का है…आदि आदि।

यहाँ तक कि अपने शहर में आकर मुसलमान भी कई हिस्सों में बंट जाते हैं, फ़िरक़े अपना रंग दिखने लगते हैं, क़ब्रिस्तानों और मस्जिदों पर दफनाने न दफ़नाने और दाखिल होने न होने के बोर्ड नज़र आने लगते हैं।

हम हमारे ही देश में केवल ‘हिंदुस्तानी’ बनकर क्यों नहीं रह सकते ? काश हम सभी देश वासियों को एक ही नज़र सिर्फ और ‘सिर्फ हिन्दुस्तानी’ की नज़र से देखने लगें, इस मुल्क में हमारी बस एक ही पहचान हो सिर्फ एक ‘हिन्दुस्तानी’ की इसके आगे कुछ नहीं… उसी दिन का इंतज़ार है।

(ये मेरा निजी अनुभव है जो 2005 में केन्या निवास के समय हुआ था)