तीनों बड़े हिंदी भाषी राज्यों का जनादेश क्या कहता है।

तीनों बड़े हिंदी भाषी राज्यों का जनादेश क्या कहता है।
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राजस्थान, तेलंगाना, मिजोरम, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़, 5 राज्यों में विधान सभा चुनाव संपन्न हुए, यहाँ अभी केवल तीन हिंदी भाषी बेल्ट वाले राज्यों के चुनाव में आये जनादेश की चर्चा करते हैं।

इन तीनो भाजपा शाषित राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे सामने हैं, लेख लिखने तक मध्य प्रदेश में फाइनल रिजल्ट की प्रतीक्षा जारी थी, जिसमें कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में 113 सीटों, भाजपा 109 और अन्य 8 के साथ जमे हुए था, फिलहाल इन तीनों राज्यों में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर सामने आयी है, वो कांग्रेस जिसके लिए नारा दिया गया था ‘कांग्रेस मुक्त भारत’। उसी कांग्रेस ने इन तीनों राज्यों से नारा लगाने वाली भाजपा को ही सत्ता से मुक्त कर दिया।

इस जनादेश को बारीकी से देखें तो साफ़ नज़र आएगा कि तीनों राज्यों की जनता ने मार्केटिंग के ज़रिये परोसे गए झूठे विकास, अच्छे दिन, न्यू इंडिया, विश्वगुरु भारत, काला धन वापसी, एक के बदले दस सर लाने जैसे जुमलों के खिलाफ वोट किया है।

ये जनादेश है राष्ट्रिय मुद्दों के लिए, ये जनादेश है मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुस्लिम, गाय-गंगा, अली – बजरंगबली, नामदार-कामदार, कांग्रेस की विधवा, शहरों के नाम बदलने जैसी मौलिक मुद्दों से दूर ले जाने की वाहियात हरकतों के खिलाफ।

मरते किसानों, विकराल होती बेरोज़गारी, थोपी गयी नोटबंदी, GST और बढ़ती महंगाई, मॉब लिंचिंग आदि का गुस्सा इस जनादेश में नज़र आता है, नोटबंदी इसमें सबसे बड़ी वजह रही है जिसकी सबसे बड़ी मार निम्न माध्यम वर्ग से लेकर मझोले उद्द्योग, किसान, गरीब आदमी पर पड़ी। पेट्रोल-डीज़ल से लेकर दालों और रसोई गैस के बढ़ते दामों से कौन त्रस्त नहीं है।

राजस्थान से पहले छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की बात करें तो 15 साल से जड़ें जमाये वटवृक्ष को उखाड़ फेंकना आसान नहीं था, 15 सालों में सत्ता से बाहर रहने वाले राजनैतिक दल के कार्यकर्त्ता का हौंसला टूट जाता है, मगर इन दोनों राज्यों में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने अपने हौंसले नहीं खोये और ज़मीनी मेहनत कर अपनी पार्टी के लिए पसीना बहाया और नतीजा सामने है।

राजस्थान में ये प्रसिद्द है कि पांच साल भाजपा और पांच साल कांग्रेस, भाजपा भी अब इसी फॉर्मूले का ज़िक्र कर एस्केप रुट से निकल रही है, मगर यहाँ भी बड़ी एंटी इंकम्बेंसी थी जिसे मोदी जी, अमित शाह और योगी जी की चुनावी सभाएं भी कम नहीं कर पाईं।

इन तीनो राज्यों के जनादेश को देखें तो ‘मोदी लहर’ के खात्मे का बिगुल बज चुका है, लोग मार्केटिंग के ज़रिये लुभावने सपने, योजनाओं, नारों और जुमलों से त्रस्त हो चुके थे, ज़मीनी तौर पर वास्तविकता अब आमजन को नज़र आने लगी थी।

भाषणों, मीडिया और मार्केटिंग के ज़रिये जनता को ज़्यादा दिन मूर्ख नहीं बनाया जा सकता, या चार साल केवल नेहरू या कांग्रेस को लानतें देकर नहीं बहलाया जा सकता, या “70 सालों में तुमने क्या किया ?” जैसे जुमलों के झांसे में अब जनता बिलकुल नहीं आने वाली।

इन नतीजों को 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों का सेमी फाइनल कहा जा रहा है, भाजपा के पास अब इतना समय भी नहीं बचा है कि वो इस जनादेश की मानसिकता के अनुरूप कुछ कारनामें करके दिखाए, गौ पॉलिटिक्स, हिंदुत्व, मंदिर-मस्जिद और गौत्र जैसे मुद्दों के अलावा उनकी सियासी झोली में अब कुछ भी नहीं बचा है।

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