आज़ादी के 70 साल बाद भी भारतीय मुसलमान दुर्दशा का शिकार क्यों ?

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जब भी देश में मुसलमनो पर कोई ज़ुल्म होता है तो कई हिस्सों में बंटी क़ौम अचानक से कुछ देर के लिए मुत्तहिद होकर सियासी दलों को कोसने लग जाती है, मैं भी इसी क़ौम का एक हिस्सा हूँ, और इन जज़्बातों से कई बार गुज़रा भी हूँ, इस मानसिकता को नज़दीक से देखा परखा है।

ज़्यादा उधर उधर और पीछे की बात न करके सीधे उस मासूम बच्चे अज़ीम के क़त्ल पर आते हैं, इस क़त्ल पर मुसलमान चौबीस घंटे भी मुत्तहिद होकर आवाज़ नहीं उठा पाए, अपनी अपनी सियासी समझ और पूर्वाःग्रहों के चलते कई खेमों में बंट कर सियासी दलों को कोसने लगे, एक दूसरे खेमे पर इलज़ाम तराशी करने लगे, जैसा कि हमेशा से होता आया है, किसी ने किसी सियासी दल को कोसा तो किसी ने किसी दूसरे दल को इसका ज़िम्मेदार ठहराया।

कुछ नाबालिग डिजिटल क्रांतिकारियों ने हर बार कि तरह इस संवेदनशील मुद्दे को एक दूसरे पर थूकने और वैचारिक कीचड में लौटने का मैदान बना दिया, जैसा कि ये हर बार करते आये हैं, और इस मंच पर शायद हैं भी इसी लिए कि मौक़ा मिले तो सामने वालों पर थूकें वैचारिक कचरा फैलाकर तमाशे करें।

खैर….अब आगे की बात करते हैं कि आखिर आज़ाद भारत में मुसलमान इन हालातों में क्यों और कैसे है ? और हालात से निकलने या सुधार करने का तरीक़ा क्या है ? क्या वाक़ई आज के हालात के लिए सियासी दल ही ज़िम्मेदार हैं ?

सबसे पहले बात करते हैं मुसलमानों की सियासी समझ की, भारत में मुसलमानों का एक अच्छा ख़ासा हिस्सा ऐसा भी है जो डेमोक्रेसी और सेक्युलरिज़्म को अप्रत्यक्ष रूप से हराम कहता आया है, जब उनके लिए डेमोक्रेसी और सेक्युलरिज़्म ही हराम है तो फिर इस देश में ऐसे लोगों की सियासी भागीदारी क्या होगी ? एक नागरिक के तौर पर इस देश के लिए अपनी तौर पर क्या योगदान दे पायेगा ?

जब किसी समुदाय के लिए डेमोक्रेसी ही हराम है सेक्युलरिज़्म ही हराम है तो फिर उस समुदाय से देशभक्ति या देशप्रेम का सवाल ही कहाँ पैदा होता है ? ऐसी ही विचारधारा के चलते मुस्लिम समुदाय को लेकर सिस्टम में एक पूर्वाग्रह बना हुआ है. बात कड़वी है, और इसी के चलते विचारधारा को सिस्टम में कुंडली मारे बैठी मुस्लिम विरोधी लॉबी द्वारा डिकोड किया जा चुका है।

क्या आपको पता है कि देश की टॉप इंटेलीजेंस एजेंसियों में मुसलमानों के लिए नो-एंट्री का बोर्ड लगा हुआ है ? 1969 में अपने गठन से लेकर आज तक रॉ ने किसी मुस्लिम अधिकारी की नियुक्ति नहीं की है, SPG (स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप) और NSG (नेशनल सिक्योरिटी गार्ड) में सिखों और मुसलमानों का प्रवेश वर्जित है ? नहीं ना ?

तो सुनिए 5 सितम्बर 2014 को तहलका में बृजेश सिंह जी का एक लेख प्रकाशित हुआ था जिसमें इस मुद्दे पर तार्किक ढंग से रौशनी डाली थी, इस लेख में बताया था कि रॉ और एसपीजी की तरह ही NTRO (नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन) ने भी किसी मुस्लिम अधिकारी को अपने यहां नियुक्ति नहीं किया. कुछ ऐसा ही हाल मिलिट्री इंटेलीजेंस (MI) का भी है।

लेख में कई तथ्य हैं और काफी लम्बा भी है आप उसे इस लिंक   पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते हैं।

ये तो हो गयी बात मुसलमानों के बीच डेमोक्रेसी, सेक्युलरिज़्म और देशभक्ति को हराम समझने की, जिसे सिस्टम और सियासी दलों ने अपने तौर पर भुनाया, और इन संस्थाओं में उनके लिए नो एंट्री का बोर्ड लगाया, अब आगे बात करते हैं देश की मुख्यधारा में मुसलमानों की हालत और हिस्सेदारी की।

जब भी मुसलमानों पर कोई ऊँगली उठाता है तो वो जोश में आकर राहत इंदौरी साहब का शेर “‘सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है !” कहकर अपने कॉलर ऊंचे कर लेता है, ठीक है भाई किसी के बाप का नहीं है, आपका भी है, मगर आप कौन ? भारतीय मुस्लिम ना ? आपकी सिस्टम में, मुल्क की मुख्यधारा में हिस्सेदारी ?

इंडोनेशिया के बाद मुसलमानों की सबसे बड़ी आबादी भारत में बसती है जो कि इस देश की आबादी का 14 प्रतिशत के लगभग है, कभी सोचा है कि दुनिया में मुसलमानों की इस सबसे बड़ी आबादी का इस देश की मुख्यधारा में कितना योगदान है ?

या फिर मुल्क के आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, औद्यौगिक, राजनैतिक, तकनीकी विकास में हमारा योगदान कितना प्रतिशत है ? क्यों पंचर बनाने वालो का ठप्पा माथे पर चिपक गया है ?

आज संघ की मेहनत देख सकते हैं, देश के सर्वोच्च पदों से लेकर सियासत और सिस्टम तक, साइबर दुनिया से लेकर ब्यूरोक्रेट्स तक भरमार है, इसके पीछे उसकी आधी शताब्दी की मेहनत और एजेंडा मुंह से बोल रही है, और हम है कि हर शोबे में पिछड़ा होते हुए भी जुम्मन और गय्यूर के कीचड में ही लौट रहे हैं।

आंकड़ों के अनुसार भारतीय पुलिस सेवा में मुसलमान केवल 4 प्रतिशत, प्रशासनिक सेवा में 3 फीसदी और विदेश सेवा में मात्र 1.8 प्रतिशत हैं, यही नहीं देश के सबसे बड़े नियोक्ता के तौर पर मशहूर रेलवे के कुल कर्मचारियों में से महज 4.5 फीसदी मुसलमान हैं।

कभी ध्यान दिया है कि हमारी आधी आबादी यानी मुस्लिम औरतें शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक तौर पर किस हालत में हैं ? सच तो ये है कि भारत की लगभग 60 फीसदी मुस्लिम महिलाएं शिक्षा से वंचित हैं, इनमें से 10 फीसदी महिलाएं ही उच्च शिक्षा ग्रहण कर पाती हैं जबकि शेष 30 फीसदी महिलाएं दसवीं कक्षा तक अथवा उससे भी कम तक की शिक्षा पाकर घर की बहु बनने के लिए मजबूर हो जाती हैं।

देश की आबादी के प्रतिशत के हिसाब से सबसे ज़्यादा मुस्लिम भिखारी हैं, देश में 3.7 लाख भिखारी हैं इनमें हर चौथा भिखारी मुस्लिम है, न मानें तो सर्च करके देख सकते हैं या इस लिंक इस लिंक   पर फैक्ट पढ़ सकते हैं : –

इन सब बातों का लब्बो लुबाब अगर आप समझ पाए हों तो वो ये है कि तालीम में क़ौम का बहुत ही पिछड़ा होना है, हालाँकि अब इसमें सुधार की बातें की जाती हैं मगर ये रफ़्तार बहुत ही धीमी है।

हाँ हमें एक तरक़्क़ी ज़रूर कर ली है, वो ये कि अपने अपने फ़िरक़े मसलक बाँट लिए हैं, अपनी अपनी मस्जिदें बाँट लीं हैं, बोर्ड लटका दिए गए हैं कि फलां फलां की नो एंट्री है, इन हरकतों के चलते भी आप सोच रहे हैं कि आपकी क्यों नहीं सुनी जाती, आपकी हालत ऐसी क्यों है तो आप बहुत ही मासूम हैं।

फिर क़ौम की इस हालत का ज़िम्मेदार कौन ? सियासी दल ? जी नहीं सियासी दल तो बहुत बाद में आते हैं, किसी भी सियासी दल का कोई भी नेता आपके घर आपके बच्चों का हाथ पकड़ कर स्कूल छोड़ने नहीं आने वाला, ये तो आपको ही करना होगा, आपको ही सोचना होगा, प्राइवेट में न सही सरकारी स्कूल में मदरसों में RTE (शिक्षा का अधिकार) के तहत स्कूलों में रिज़र्व सीटों पर बच्चों के दाखिले करवाइए।

अपने आस पास कोई भी गरीब बेसहारा मुस्लिम परिवार हो उसे उसके बच्चों को पढ़ने के लिए हौंसला दीजिये, उसकी मदद कीजिये, एक बस्ता चार कॉपी भी बहुत हैं, RTE के तहत आस पास के स्कूलों में एडमिशन के लिए उन्हें बताइये। बेटे हों या बेटियां सभी को जितनी हो सके बराबरी से तालीम दिलवाइये यही नस्ल आगे जाकर अपनी तालीम और क़ाबिलियत से मुल्क के बेहतर नागरिक बनकर तैयार होंगे, मुल्क की मुख्य धरा में अपना योगदान देंगे, सिस्टम में इनकी मौजूदगी नज़र आएगी।

कुछ महीनों पहले मेरी मुलाक़ात “शाहीन ग्रुप ऑफ इंस्टीटूशन्स” के संस्थापक जनाब डा. अब्दुल क़दीर साहब से कोटा आमद के दौरा हुई थी, डा. अब्दुल क़दीर साहब डा. अब्दुल क़दीर साहब का नाम मुल्क में तालीमी बेदारी के आइकॉन के तौर पर लिया जाता है, और उनके तालीमी इदारे “शाहीन ग्रुप ऑफ इंस्टीटूशन्स” का नाम दुनिया भर में बेहतरीन तालीम और कोचिंग के लिए जाना जाता है।

2008 से “शाहीन ग्रुप ऑफ इंस्टीटूशन्स” के 1764 स्टूडेंट्स ने प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होकर मेडिकल, इंजीनियरिंग और बाक़ी के प्रोफेशनल गवर्नमेंट कोर्सेज में प्रवेश लिया ! शाहीन इंस्टिट्यूट के 900 स्टूडेंट्स ने MBBS में सफलता हासिल कर एक रिकॉर्ड बनाया है।

मैंने जब उनका इंटरव्यू लिया था तो एक कांटे की बात उन्होंने कही थी, वो ये कि “आजकल लोग अपने लिए बड़े बड़े मकान तामीर कर रहे हैं, और इस तामीर पर दिल खोलकर खर्च कर रहे हैं, मगर लोग अपनी नस्ल की तामीर के लिए बिलकुल भी फिक्रमंद नहीं हैं, जबकि नस्ल की तामीर मकान की तामीर से ज़्यादा अहम् है, उनका कहना था कि एक बच्चे/बच्ची को पढ़ाया तो समझिये कि एक नस्ल को शिक्षित कर दिया।”

आज मुल्क का मुसलमान ये बात गाँठ बाँध लें कि तालीम से अब कोई बच्चा या बच्ची नहीं पिछड़ेगा, किसी भी हाल में अपने बच्चों को हर हाल में जितना हो सके तालीम दिलाएंगे, साथ ही अपने आस पास के गरीब मुसलमानों के बच्चों को तालीम के लिए प्रेरित करेंगे, तो आने वाला कल उनकी उसी नस्ल का होगा, ये तब्दीली ज़रूर रंग लाएगी।

हमें बहुत सारे डा. ज़ाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद, सर सय्यद अहमद, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, कलाम साहब, अज़हरुद्दीन, IAS टॉपर अतहर आमिर, डा. अब्दुल क़दीर जैसे लोग चाहियें, और इसके लिए तालीम सबसे पहली ज़रुरत है।

तालीम होगी तो हर शोबे में क़ौम के बच्चे अपनी मौजूदगी दर्ज कराएँगे, देश की मुख्यधारा में, सिस्टम में जब उनकी बा-वक़ार मौजूदगी रहेगी तो सियासत भी आपको पूछेगी, फ़िक्र करेगी, सिस्टम में क़ौम की भागीदारी बढ़ेगी तो साथ में सियासी भागीदारी में भी हिस्सेदारी बढ़ेगी।

और जब तक सिस्टम और सियासत में आपकी मज़बूत भागेदारी नहीं है आपकी हालत सुधरने वाले नहीं ना ही आपको इंसाफ मिलने वाला, सियासत के लिए आप वोटर लिस्ट में मौजूद भीड़ के अलावा कुछ भी नहीं।

याद रखिये कि जो जंग तलवार, बंदूक, तोप और रॉकेट से नहीं जीत सकते वो जंग आप ‘तालीम’ से जीत सकते हैं।।

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