देश में हर 8 वे मिनट में एक बच्ची गायब होती है।

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बाबाओं के आश्रमों, शेल्टर होम्स में लाई गयी बच्चियों, रेस्क्यू की गयी बच्चियों और उनके यौन शोषण की कहानियां आम हो चली हैं, और साथ ही सवाल उठने लगे हैं कि इन अय्याश बाबाओं के आश्रमों, देह व्यापर का अड्डा बने शेल्टर होम्स में सैंकड़ों, हज़ारों की संख्या में ये नाबालिग बच्चियां आती कहाँ से हैं ?

कैसे भारत नाबालिग बच्चे और बच्चियों का बड़ा बाजार बनता जा रहा है, आंकड़ों  की मानें तो भारत में औसतन हर आठवें मिनट में एक लड़की गायब हो जाती है, और औसतन 180 बच्चे बच्चियां प्रतिदिन गायब हो रहे हैं।


India Today के अनुसार हर साल एक लाख बच्चे गायब होते हैं इनमें से 45 % का पता ही नहीं लग पाता है, 2011 से 2014 के बीच 3.25 लाख बच्चे गायब हुए जिनमें 2 लाख लड़कियां थीं।

इस 8 मिनट को 60 से गुणा कीजिये तो हर घंटे 480 नाबालिग बच्चियां गायब होती हैं, और इन 480 को 24 से गुणा करें तो हर दिन 11500 नाबालिग बच्चियां गायब हो रही हैं। और इस तरह इन आंकड़ों को माह और साल के डरावने और चिंताजनक आंकड़े सामने आते जायेंगे, और इन डरावने आंकड़ों की रौशनी में आपको इन अय्याश और ढोंगी बाबाओं के आश्रमों में, शेल्टर्स होम्स में और देह व्यापर की मंडियों की चार दीवारी के पीछे सिसकती मासूम बच्चियों की मौजूदगी समझ आएगी।

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो 2014 के आकड़ें देश में बच्चों पर हो रही हिंसा की सबसे खतरनाक तस्वीर पेश करते हैं जिसके अनुसार 2014 में बच्चों के साथ हिंसा की कुल 89423 घटनायें हुई हैं। तथा देश में कुल बच्चों के अपहरण के 37854 और बलात्कार के 13766 मामले दर्ज हुए हैं, ये तो वे संख्याऐं हैं जो दर्ज की गई हैं।

CRY (Child Rights and You) के अनुसार 2011 से 2014 के बीच 3.25 लाख नाबालिग बच्चों की आधिकारिक गुमशुदगी दर्ज की गयी जिसमें 2 लाख बच्चियां थीं।

नीचे दिए गए चित्र में आप उन टॉप पांच राज्यों को देख सकते हैं जहाँ से बच्चों की तस्करी सबसे अधिक की जाती है, इसमें पहले नंबर पर कोलकाता है, उसके बाद बिहार, उड़ीसा, आसाम, और हरियाणा हैं।

उपरोक्त आंकड़ों से आप समझ सकते हैं कि देश में ढोंगी बाबाओं के आश्रमों में, शेल्टर्स होम्स में और देह व्यापर की मंडियों में हज़ारों की संख्या में ये नाबालिग बच्चियां कैसे पहुँचती हैं।

बात सिर्फ देह व्यापर तक भी सीमित नहीं है, बल्कि 2016 के ग्लोबल स्लेव इंडेक्स के मुताबिक भारत को दुनिया का ‘स्लेव कैपिटल’ बताया गया था।  Index के मुताबिक दुनिया भर में आधुनिक गुलामी झेल रहे लगभग 45,80,0000 करोड़ लोगों में से अकेले भारत में ही करीब 18,35,0000 करोड़ लोग इसका शिकार हैं, यानी डेढ़ करोड़ लोग देश में कहीं न कहीं बंधुआ मज़दूर, घरेलू नौकर या बाल श्रमिक के तौर मजबूरी में गुलामों की तरह काम में लिए जा रहे हैं।

देश व्यापर से लेकर गुलामी करते इन बंधुआ मज़दूरों की इतनी बड़ी संख्या भी चौंकाने वाली है, ये सब इसी मानव तस्करी के सुनियोजित रैकेट से लिए जाते हैं। सबसे दुखद बात ये है कि मानव तस्करी के बहुत बड़े और सुनियोजित रैकेट को तोड़ने और इसे रडार पर लाने के लिए सरकार के पास कोई कार्य योजना बिलकुल भी नज़र नहीं आती, आश्रमों, शेल्टर होम्स में जब यौन उत्पीड़न के मामले उछलते हैं तो इस पर राजनीति शुरू हो जाती है, दोषारोपण शुरू हो जाते हैं।

जबकि ज़रुरत इस बात की है कि देश के सभी राजनैतिक दल मिलकर सरकार को मजबूर करें और सहयोग दें कि इस नेक्सस की रीढ़ पर वार किया जाए, इस रैकेट को तोडा जाए, सख्त सजा का प्रावधान लाया जाए ताकि हर साल लाखों नाबालिग बच्चियां इन दरिंदों के हत्थे ना चढ़ें। न जाने सरकारें इस मामले में कब गंभीर होंगी।

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