21 मई 2018 को एक किताब प्रकाशित हुई थी जिसका नाम था ‘Spy Chronicles’ ये किताब पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी ISI के पूर्व डीजी असद दुर्रानी ने पूर्व रॉ चीफ ए. एस. दुलत के साथ मिलकर लिखी थी।

पाकिस्तानी सेना इस किताब के प्रकाशन से तिलमिला गयी थी, उसने भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर छपी इसी किताब को लेकर असद दुर्रानी को तलब भी किया था। पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफ्फूर ने ट्विटर पर लिखा था कि लेफ्टिनेंट जनरल असद दुर्रानी (रिटायर्ड) को 28 मई 2018 को पाकिस्तानी सेना के हेडक्वॉर्टर में बुलाया गया है।

India today की खबर के अनुसार इस किताब में एक दावा किया गया था कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से ISI खुश था, किताब में यह भी दावा किया गया है कि ISI मोदी के प्रधानमंत्री बनने से ‘खुश’ था। खबरों के मुताबिक, किताब में दुर्रानी ने लिखा है कि पाकिस्तान की सीक्रेट सर्विस एजेंसी आईएसआई की पहली पसंद मोदी ही हैं।

ISI की पहली पसंद मोदी ही क्यों हैं ? इसके पीछे की वजह असद दुर्रानी बताते हैं कि ISI जानती है कि मोदी की ‘कट्टरपंथी’ छवि और निर्णय भारत की छवि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करेगी, इससे न सिर्फ भारत की सेक्युलर छवि को वैश्विक स्तर नुकसान पहुंचेगा बल्कि भारत का आंतरिक संतुलन बिगड़ेगा जिसका पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर फायदा होगा।

सभी को पता होगा जब मोदी जी बिना बुलाये नवाज़ शरीफ से मिलने पाकिस्तान पहुंच गए थे उस घटना पर किताब में ISI के पूर्व डीजी असद दुर्रानी नेएक जगह लिखा है कि मोदी जी नवाज शरीफ की पोती की शादी में भाग लेने के लिए रायविंद पहुंचे, और उनके नाटक और तमाशे ने लोगों के बीच केवल शानदार भ्रम पैदा किया।

इस किताब में कश्मीर समस्या, करगिल युद्ध, ओसामा बिन लादेन का मारा जाना, कुलभूषण जाधव की गिरफ्तारी, हाफिज सईद, बुरहान वानी समेत कई मुद्दों पर बात की गई है।

कश्मीर समस्या के निदान के लिए इस किताब में विस्तार से लिखा गया है, ।SI के पूर्व डीजी असद दुर्रानी के अनुसार दोनों देशों को संघर्ष के बजाय सहयोग के ज़रिये इस समस्या को सुलझाना चाहिए। इसपर उन्होंने कश्मीर के लिए किये गए कई समझौतों और उनके परिणामों के साथ साथ अपने विचार भी रखे हैं। इस समस्या को उलझाए रखे जाने के समीकरणों पर भी विस्तार से रौशनी डाली है।

इस किताब स्पाई क्रॉनिकल की ख़ास बात पर आते हैं कि ‘ISI मोदी के प्रधानमंत्री बनने से ‘खुश’ है।’ और इसके पीछे किताब के लेखकों ने तर्क दिया है कि मोदी की कट्टरपंथी छवि से पाक को राजनीतिक लाभ होता है, इसका दूसरा पहलू देखें तो भारत में भी भाजपा और खासकर प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह आदि अपने भाषणों में पाकिस्तान का ज़िक्र खास मौक़ों पर करते हैं।

29 अक्टूबर 2015 को अमित शाह ने बिहार में चुनावी रैली में कहा था कि “अगर गलती से भी बीजेपी इस चुनाव में हारती है तो पाकिस्तान में पटाखे फोड़े जाएंगे, क्या आप लोग ऐसा होने देंगे ?”

और बिहार की जनता ने इस फूहड़ राजनैतिक हथकंडे की हवा निकाल दी थी, भाजपा की करारी हार हुई थी।

आज फिर मोदी जी ने अपनी एक सभा में भी पाकिस्तान को याद करते हुए कहा कि ” कॉंग्रेसी नेता बोलते यहां हैं और तालियां पाकिस्तान में बजती हैं. कांग्रेस उन ताकतों के साथ खड़ी है जो हमारी सेनाओं को मजबूत नहीं होना देना चाहते हैं।”

स्पष्ट है कि जहा पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई खुश है कि भारत में मोदी जी प्रधानमंत्री हैं तो इधर मोदी जी भी इस मामले में पाकिस्तान को निराश नहीं कर रहे, उनकी राजनीति पाकिस्तान का नाम लिए बिना पूरी नहीं होती।

जबकि एक RTI से मांगी गयी जानकारी के अनुसार एक के बदले दस सर लाने की हुंकार भरने वाली सरकार के कार्यकाल में ही सबसे ज़्यादा घुसपैठ हुई और ज़्यादा सैनिक शहीद हुए हैं।

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