“एक धक्का और दो जामा मस्जिद तोड़ दो” चलेगा, पर “भारत में डर लगता है”, नहीं चलेगा ?

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अजमेर में तीन दिन तक चलने वाले साहित्य महोत्सव के पांचवे सत्र में एक कार्यक्रम को संबोधित करने आये अभिनेता नसीरुद्दीन शाह को दक्षिणपंथी संगठनों के विरोध के चलते वापस लौटना पड़ा, कार्यक्रम के पहले अनेक दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम स्थल के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। एक प्रदर्शनकारी ने नसीरुद्दीन शाह के पोस्टर पर स्याही भी फेंक दी।

नसीरुद्दीन शाह के “एक गाय की मौत को एक पुलिस अधिकारी की हत्या से ज्यादा तवज्जो दी जा रही है।” जैसे बयान देने की वजह से दक्षिणपंथी संगठन तिलमिला गए हैं, जबकि बॉलीवुड और साहित्यकार उनके समर्थन में आ खड़े हुए हैं।

अभी इसी माह की बात है दिल्ली में इन्ही दक्षिणपंथी संगठनों ने एक विशाल रैली निकाल कर खुले आम नारे लगाए थे कि “एक धक्का और दो, जामा मस्जिद तोड़ दो”, इन नारों पर न तो मीडिया की अंतरात्मा जागी थी, ना क़ानून टूटा था, न ही देश की सामाजिक समरसता को चोट पहुंची थी, ना ही देश के कथित ठेकेदार आगे आये थे।

नसीरुद्दीन शाह ने देश में नासूर की तरह फ़ैल चुके इस दक्षिणपंथी छद्म राष्ट्रवाद और गौ पॉलिटिक्स की जड़ पर सीढ़ी और सटीक चोट की है, इस चोट से वही सबसे ज़्यादा तिलमिलाए हैं जो इस कुंठित लठैती के दोषी हैं।

नसीरुद्दीन शाह के साथ ये शर्मनाक घटना राजस्थान में हुई है जिस राजस्थान ने अली-बजरंबली की उन्मादी राजनीती को नकार दिया, उस राजस्थान में हुई है जहाँ जनता ने पोकरण की हिन्दू बहुल सीट से महंत प्रतापपुरी को नकार कर कांगेस के मोहम्मद सालेह को जिताया था, उस राजस्थान में हुई है जहाँ मुस्लिम बहुल सीट से सचिन पायलट को जिताया गया।

ये घटना अशोक गहलोत के शपथ लेने के बाद कहिये कि उनके शासन काल में हुई है, इसलिए ये और भी दुखद है कि कांग्रेस सरकार और स्थानीय प्रशासन इन छद्म राष्ट्रवादी दक्षिणपंथियों पर लगाम नहीं लगा पाया, एक प्रसिद्द अभिनेता की सुरक्षा नहीं कर पाया, उसकी अभिव्यक्ति पर लठैती की गयी उसे वापस लौटना पड़ा और सरकार चुपचाप देखती रही।

ये वही राजस्थान है जहाँ पहलू खान और रकबर खान को गाय बचाने का बहाना कर गौरक्षक गुंडों ने मौत की घाट उतार दिया था, जनता ने इस सरकार को इसी उम्मीद से चुना था कि प्रदेश में इन शक्तियों पर लगाम लगेगी, मगर नतीजा निराशापूर्ण ही निकला।

नसीरुद्दी शाह के साथ हुई ये घटना इस बात का प्रमाण है कि मौजूदा कांग्रेस सरकार भी इन दक्षिणपंथी सांप्रदायिक ताकतों पर लगाम लगाने के मूड में नहीं है, अगर ऐसा ही होता रहा तो भविष्य में पहलू खान और रकबर खान के परिजनों को इन्साफ मिलना तो दूर की बात है बल्कि शायद राजस्थान में और पहलू खान और रकबर खान इन गुंडों की साजिशों और कुंठाओं का शिकार बनेंगे।

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