क्या भारत में महिला के बजाय गाय बन कर जीना ज़्यादा सुरक्षित है ?

क्या भारत में महिला के बजाय गाय बन कर जीना ज़्यादा सुरक्षित है ?
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जून 2017 की बात है सोशल मीडिया और वैश्विक मीडिया में गाय का मुखौटा पहने लड़कियों के फोटो वायरल हुए थे, बुलंदशहर में गाय को लेकर मार डाले गए सुबोध कुमार सिंह के बाद आगरा में संजलि को जलाकर मार देने के बाद भी न्याय नहीं मिलने पर फिर से देश में यही सवाल उठने लगे हैं कि इस देश में क्या गाय पहले है और इंसान बाद में ?

सभी जानते हैं कि गाय से सम्बंधित मामलों में तुरंत संज्ञान लिया जाता है, गोकशी की झूठी सूचना पर ही गोरक्षक दल के साथ पुलिस भी दौड़ी चली जाती है, शहर में बवाल हो जाता है, मार काट मच जाती है, लोग मार दिए जाते हैं, मगर किसी बच्ची के साथ बलात्कार या उसको ज़िंदा जलाकर मार डालने के बाद भी लोगों की संवेदनाएं नहीं जागतीं, जैसा कि संजलि मामले में हो रहा है, नेताओं के साथ साथ प्रशासन भी लापरवाह नज़र आ रहा है।

ये हैरानी की बात है कि देश में महिला सुरक्षा के बजाय गाय की सुरक्षा की चिंता ज़्यादा की जा रही है, वो भी इस नयी सरकार के आने के बाद, विश्व के लिए भी ये अजीब विचारधारा हैरानी की बात है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में 34,000 से अधिक बलात्कार के मामले दर्ज किए गए थे, लेकिन इनमें से केवल 21% मामलों में आरोपियों को सजा मिली है।

भारत में हर 15 मिनट में एक बलात्कार की रिपोर्ट सामने आती है। एक प्रश्न ये उठता है यदि सरकार गायों के मामले को जरूरी समझती है तो आधी आबादी की सुरक्षा के लिए इस तरह की कोई आवश्यकता सरकार को क्यों नहीं दिखती ?

इंसानों या महिलाओं पर गायों को प्राथमिकता देता देख कलकत्ता के 23 साल के स्वतंत्र फोटोग्राफर सुजात्रो घोष ने एक फोटो-प्रोजेक्ट करवाया था, जिसमें उन्होंने लड़कियों को गाय का मास्क पहनकर फोटो खिंचवाए गए थे।

सुजात्रो कहते हैं, “हमारे देश में हर चीज को धार्मिक चश्मे से देखा जाता है, गाय का मुखौटा इसलिए चुना कि देश की राजनीति तब इसी के इर्द-गिर्द घूम रही थी।”

वो आगे कहते हैं कि ‘महिलाओं से छेड़खानी के दौरान लोग नज़रें बचा कर निकल जाते हैं, लोग महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों के मुद्दे पर गंभीर नहीं हैं, बलात्कार पीड़िता को न्याय पाने में यहां बरसों गुजर जाते हैं, लेकिन किसी गाय की हत्या या महज बीफ़ खाने और ले जाने की हालत में कथित अभियुक्त की मौके पर ही पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती है।’

सुजात्रो के इस प्रोजेक्ट को मिलीं प्रतिक्रियाएं काफी हद तक सकारात्मक थीं, वहीँ कुछ लोगों ने इसका मजाक भी बनाया था। घोष को नकारात्मक प्रतिक्रियाओं की परवाह नहीं है। सुजात्रो बताते हैं, ‘मेरा इरादा कभी भी गाय का मजाक बनाने का नहीं है। मैं चाहता हूं कि जो लोग गायों को माताओं के रूप में मानते हैं, लड़कियों के लिए भी उनके मन में सुरक्षा और सम्मान की भावना हो।’

सुजात्रो घोष ने सरकार से सवाल किया था कि महिलाओं से ज्यादा गाय की सुरक्षा पर ध्यान क्यों दिया जा रहा है। हमारे देश में क्या हो रहा है? देश के संविधान की तरह मेरी सोच भी धर्मनिरपेक्ष है। महिलाओं की असुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है।

उनके इस प्रयोग और सन्देश की पूरी दुनिया में चर्चा हुई थी, एक अमरीकी टीवी चैनल टीवाईटी टीवी ने अपने ‘द यंग तुर्क’ कार्यक्रम में उनकी तस्वीरों के साथ एक रिपोर्ट दिखाई थी, साथ ही दुनिया भर के अखबारों में उनकी ये तस्वीरें छपीं थीं।

संजली के साथ हुई बर्बर घटना और राज्य सरकार के साथ प्रशासन की लापरवाही और असंवेदनशीलता के चलते आज फिर से सुजात्रो घोष का ये अनूठा प्रयोग और सन्देश याद आ गया कि इस देश में लड़कियां गाय का मुखौटा पहन लें तो शायद गाय जितनी ही सुरक्षित रह सकती हैं।

 

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