2014 के चुनावों और उसके बाद का वो समय जब देश में मोदी जैकेट के प्रति लोगों में दीवानगी थी, इस जैकेट को बनाने और बेचने वालों ने कभी इससे अच्छी कमाई की थी, मगर अब लोगों का इस मोदी जैकेट के प्रति मोह भंग हो गया है। Business Today की खबर के अनुसार महाराष्ट के औरंगाबाद में मोदी जैकेट बिक्री में भारी गिरावट देखी गयी है। इसके चलते मोदी जैकेट के विक्रेताओं में निराशा व्याप्त है।

औरंगाबाद के एक स्थानीय व्यापारी ने कहा कि एक समय था जब प्रति दिन उसके आउटलेट से हर रोज़ 35 मोदी जैकेट की बिक्री हो जाया करती थे, जो अब 1 जैकेट प्रति सप्ताह तक गिर गयी है। वहीँ एक और व्यापारी गुरविंदर सिंह ने कहा कि GST, नोटबंदी और राज्य में सूखा पड़ने की की वजह से अन्य कपड़ों की तरह जैकेट की ब्रिक्री पर भी प्रभाव पड़ा है। औरंगाबाद के गुलमंडी, तिलक पथ, औरंगपुरा, सर्राफा, ओसमापुरा और सिडको क्षेत्र के कई व्यापारियों ने भी लगभग यही बातें कही।

रेडीमेड कपड़ा व्यापारी राजेंद्र भावसर, जो अन्य  रेडिमेड पारंपरिक परिधानों के साथ इन जैकेट का स्टॉक रखते हैं, ने कहा कि पिछले एक साल में उन्होंने अपने दुकान में 10 से अधिक ‘मोदी जैकेट’ नहीं बेचे। वे कहते हैं, “मुझे अब यह समस्या हो रही है कि बिना बिके जैकेट का स्टॉक ज्यादा हो गया है। मैंने काफी ज्यादा पैसे इसमें लगा दिए हैं लेकिन फायदा कुछ नहीं हो रहा है।” हमारे पास हमारे पास अब कोई मोदी जैकेट लेने नहीं आ रहा।

स्थानीय दर्जी दिलीप लोखंडे जो कि हारून मास्टर के नाम से लोकप्रिय हैं, कहते हैं कि “अब गर्मी आने वाली है, लोग खादी, लिनन और सूती शर्ट में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं।” उन्होंने कहा, “कोई भी हमारे पास मोदी जैकेट सिलवाने नहीं आ रहा है।”

दिलीप लोखंडे कहते हैं कि उनके जिन कारीगरों को जैकेट बनाने में महारत हासिल थी, वे अब दूसरे फॉर्मल कपड़े सिलने लगे हैं। उन्होंने आगे कहा, “हम ‘मोदी जैकेट’ की सिलाई के लिए 200 रुपये से 300 रुपये का चार्ज लेते थे, लेकिन अब हमारे कारीगर फॉर्मल ड्रेस सिलकर ज्यादा कमा रहे हैं।”

उनका ये भी कहना है कि आगामी लोकसभा चुनावों के बाद भी उन्हें नहीं लगता कि मोदी जैकेट की 2014 जैसी लोकप्रियता फिर से लौटकर आएगी।