हिंदू और मुस्लिम महिलाओं ने एक-दूसरे के पतियों को किडनी दान कर पेश की मिसाल।

हिंदू और मुस्लिम महिलाओं ने एक-दूसरे के पतियों को किडनी दान कर पेश की मिसाल।
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नफरत की आंधियों में भी मोहब्बत और सौहार्द का परचम बुलंद करने वाली ख़बरें मिलती हैं तो इंसानियत पर यक़ीन बढ़ता जाता है, Times of India की खबर है कि मुंबई के एक अस्पताल में हिन्दू और मुस्लिम महिलाओं ने एड दूसरे के पतियों को अपनी अपनी किडनियां दान कर मिसाल पेश की है।

यह कहानी ठाणे और बिहार के दो परिवारों की है, जो 6 महीने पहले तक एक-दूसरे से बिल्कुल अपरिचित थे। दोनों का इलाज कर रहे नेफ्रॉलजिस्ट डॉक्टर हेमल शाह इन दोनों परिवारों को करीब लाये और एक टीम के तौर पर मिलकर काम किया, जिसका नतीजा पिछले सप्ताह सफल किडनी ट्रांसप्लांटेशन के तौर पर मिला।

एक ओर जहां 3 बच्चों के पिता नदीम पिछले 4 सालों से डायलिसिस पर चल रहे थे, वहीं किडनी की बीमारी से ग्रस्त रामस्वार्थ को इलाज की वजह से नालासोपारा को ही दूसरा घर बनाना पड़ा था। दोनों ही पीड़ित किडनी ट्रांसप्लांट के लिए ब्लड ग्रुप मैच होने वाले अपने परिवार-रिश्तेदारों में से डोनर्स की तलाश कर रहे थे, लेकिन कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी।

सैफी हॉस्पिटल में नेफ्रॉलजिस्ट डॉक्टर हेमल शाह को दोनों केस के बारे में मालूम था, उन्होंने दोनों परिवारों को आपस में मिलाया और बातचीत के बाद ‘स्वैप ट्रांसप्लाटेशन’ का विकल्प सामने आया। रामस्वार्थ का ब्लड ग्रुप (A) नाजरीन के साथ मैच कर गया, जबकि नदीम का ब्लड ग्रुप (B) सत्यादेवी के साथ मैच कर गया। एक महीने तक सोच-विचार के बाद दोनों ही परिवार स्वैप ट्रांसप्लांटेशन के लिए राजी हो गए।

नेफ्रॉलजिस्ट डॉक्टर हेमल शाह स्वैप ट्रांसप्लांटेशन की सफलता पर खुश हैं उनका कहना है कि ये आसान और कम पेचीदा है, स्वैप ट्रांसप्लांट के लिए दो इच्छुक परिवारों का मिलना ही काफी है, इससे समय और पैसे की बर्बादी नहीं होती।

मुंबई के सैफी हॉस्पिटल में 14 मार्च को वर्ल्ड किडनी डे के मौके पर दोनों को किडनियां ट्रांस्पलांट कर दी गयीं। सर्जरी के बाद ठाणे निवासी नदीम (51) और नजरीन (45) की बिहार निवासी रामस्वार्थ यादव (53) और उनकी पत्नी सत्यादेवी (45) के साथ एक अनोखा ही रिश्ता बन गया।

रामस्वार्थ के बेटे संजय ने कहा, ‘ हम कभी भी नजरीन आंटी का एहसान नहीं चुका पाएंगे। मेरे पिता पिछले दो सालों से बहुत तकलीफ भरी जिंदगी जी रहे थे। उनका एकमात्र इलाज ट्रांसप्लांटेशन ही था, और बात जब जिंदगी और मौत की हो तब धर्म नहीं दिखता है। हमारे रिश्तेदारों ने आर्थिक मदद तो की, लेकिन कोई भी किडनी देने के लिए तैयार नहीं था। नजरीन आंटी और मेरी मां सत्यादेवी दोनों ही इतने दिनों में अच्छी दोस्त बन गईं और एक दूसरे से किडनी ट्रांसप्लांटेशन से जुड़ी समस्याओं को साझा करती रहीं।’

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