इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरपर्सन सुधा मुर्ति टाइम्स ऑफ़ इंडिया  में छपे अपने एक निजी संस्मरण को कुछ इस तरह बताती हैं कि :

ये गर्मियों की शुरुआत थी, मैं गुलबर्गा से उदयन एक्सप्रेस में सवार हुई, ट्रैन का सेकंड क्लास स्लीपर डब्बा पूरा भरा हुआ था, मैं जैसे तैसे करके अपनी बर्थ तक पहुंची, कुछ देर में टिकट चेकर आया और टिकट चेक की उसके बाद उसने फिर कहा तुम्हारा टिकट दिखाओ, तब मैंने कहा कि टिकट तो आपको दिखा दिया, तब TC ने कहा कि मैं उसका टिकट मांग रहा हूँ जो आपकी बर्थ के नीचे छुपी हुई है।

तभी मेरी नज़र अपनी बर्थ के नीचे गयी जहाँ एक दुबली पतली लड़की छुपी हुई थी, TC उसे बाहर निकलने को कहा, वो डरी हुई लड़की बाहर आयी दुबली पतली और 13 या 14 साल उम्र होगी, लगता था काफी देर से रो रही थी, टिकट नहीं होने की वजह से TC उसे कम्पार्टमेंट से बाहर निकालने के लिए खींचने लगा, तभी मुझमें अनजानी सी भावना उभरी और मैंने उस TC से कहा कि इसके टिकट के पैसे मैं दूँगी।

टिकट चेकर ने कहा, ‘मैडम, टिकट बनवाने के बजाय इसे 10 रुपये दे दो तो ये ज्यादा खुश होगी।’

लेकिन मैंने उसे अनसुना करके लड़की का ट्रैन के आखरी स्टेशन बंगलौर तक का टिकट ले लिया, ताकि वो लड़की जहाँ चाहे उतर सके। बाद में मैंने उस लड़की से बातचीत शुरू की और उससे पूछा कि उसका नाम क्या है, लड़की ने अपना नाम चित्रा बताया, मैंने उससे पूछा कि वो कहां जा रही है और क्यों तो उसने बताया कि वो बीदर के पास के गांव की है, उसके पिता कुली थे, माँ का देहांत हो चुका है, पिता ने दूसरी शादी की और कुछ दिन बाद उनका भी देहांत हो गया, उसके बाद सौतेली माँ ने उसपर ज़ुल्म शुरू कर दिए, इसलिए वो घर छोड़ कर बेहतर भविष्य की तलाश में निकल आयी।

तब तक ट्रैन बंगलौर पहुँच चुकी थी, मैं ट्रैन से उतरी तो वो लड़की मुझे उदास नज़रों से देखने लगी, मुझे उसकी हालत पर दया आ गयी, मैं उसे लेकर अपने मित्र राम के घर ले आयी जो कि एक शेल्टर होम चलाते थे, जिसे इनफ़ोसिस सहयोग करता था।

चित्रा को अब नया घर और अपने जीवन का लक्ष्य मिल गया था, मैं लगातार चित्रा की खैरियत और पढाई लिखाई के बाए में फोन से मालूमात करती रहती थी, उसकी रिपोर्ट बहुत उम्दा थी, एक दिन मैंने उससे कहा कि मैं उसके कॉलेज की पढाई का खर्चा उठाना चाहती हूँ तो चित्रा ने कहा कि “नहीं अक्का मैं कंप्यूटर साइंस में डिप्लोमा करना चाहती हूँ ताकि मुझे जल्दी जॉब मिल जाए।”

कुछ दिन बाद चित्रा अपना डिप्लोमा पूरा किया और साथ ही उसे एक सॉफ्टवेयर कंपनी में जॉब भी मिल गया, अपनी पहली तनख्वाह से वो मेरे लिए एक साड़ी और मिठाई का डब्बा लेकर आयी, एक दिन जब मैं दिल्ली में थी तो उसका फोन आया कि उसकी कंपनी उसे अमरीका भेज रही है, जाने से पहले वो मेरा आशीर्वाद लेना चाहती है, मगर हम दोनों उस समय काफी दूरी पर थे सो मैं उसे आशीर्वाद नहीं दे सकी।

फोन, ईमेल और मेसेज के ज़रिये चित्रा लगातार मेरे संपर्क में रहती थी, साल गुज़रते गए, तभी एक बार सेन फ्रांसिस्को में ‘Kannada Koota’, प्रोग्राम में निमंत्रित किया गया, ये आयोजन अमरीका में रहने वाले कन्नड़ भाषी लोग करते थे, मुझे उसी होटल में ठहराया गया जहाँ कन्नड़ कूटा आयोजन के लोग रुके हुए थे। समापन के बाद मैंने होटल से चेक आउट किया और अपना बिल भरने काउंटर पर आयी तो मुझे बताया गया कि आपको बिल भरने की ज़रुरत नहीं है, आपका बिल सामने बैठी मेडम ने पहले ही भर दिया है।

मैंने पलट कर देखा तो सामने चित्रा एक खूबसूरत नौजवान के साथ खड़ी थी, साडी में वो बहुत सुन्दर लग रही थी, उसकी आँखें ख़ुशी से चमक रही थीं, वो दौड़कर आयी और मुझसे लिपट गयी, झुक कर मेरे पांव छुए, मैं चित्रा को ज़िन्दगी के इस गर्वीले मुक़ाम पर देखकर ख़ुशी से भाव विह्वल हो गयी, फिर मैं अपने साथ लिए प्रश्न पर लौटी और चित्रा से पूछा कि तुमने मेरा होटल का बिल क्यों भरा ?

चित्रा ने मुझे बाहों में भर कर कहा कि आपके होटल का ये बिल, गुलबर्गा से बैंगलोर तक के रेल टिकट के सामने कुछ भी नहीं है।”

सुधा मूर्ति जैसे लोगों का क़द से ऊंचे से भी बहुत ऊंचा है जो निस्वार्थ मानवीय मदद के लिए जुटे हुए हैं, उन्होंने एक बेसहारा लड़की चित्रा को सहारा देकर एक पीढ़ी को सहारा दिया है, सुधा नारायण मूर्ति जैसे लोग इस देश की पूँजी और विरासत हैं, इंसानियत के अलम्बरदार हैं, इन्हे और इनकी मानवीय मदद को लाखों सलाम।

सुधा मूर्ति (जो कि इंफोसिस के संस्थापक श्री नारायण मूर्ति की पत्नी हैं) की किताब ‘The Day I Stopped Drinking Milk: Life Stories From Here and There’ से उनके जीवन से जुड़े संस्मरण।

फोटो : गूगल से साभार.

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