सफेद दाढ़ी वाले 60 वर्षीय बुज़ुर्ग मुहम्मद अय्यूब पाला को बिलकुल भी पता नहीं चल पा रहा है कि अगस्त में गिरफ्तार उसका कैंसरग्रस्त बेटा मर गया है या ज़िंदा है।

AlJazeera की खबर के अनुसार भारतीय प्रशासित कश्मीर के कुलगाम जिले के माटीबाग गाँव के 33 वर्षीय परवेज अहमद पाला को भारतीय सुरक्षा बलों ने 6 अगस्त की मध्य रात्रि छापे में उठाया था। उसकी गिरफ़्तारी संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द करने के अगले ही दिन हुई थी, जिसकी घोषणा के बाद कश्मीर के मुस्लिम-बहुल क्षेत्र पर पाबंदियां लगा दी गयीं जो शनिवार को अपने तीसरे महीने में प्रवेश कर गईं।

परवेज अहमद के पिता मुहम्मद अय्यूब पाला कहते हैं कि “रात में सुरक्षा बलों ने हमारे घर में प्रवेश किया और उसे उठाकर ले गए। मैं उसके पीछे भागा लेकिन उन्होंने मुझे लात मारी और उसे एक वाहन में डाल दिया।” परवेज़ अहमद जिनके 8 और 10 साल के दो बच्चे हैं, एक कैंसर रोगी हैं और जीवन रक्षक दवाओं पर निर्भर थे, उनके परिवार ने कहा। उनके मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार उन्हें 2014 में ‘पैपिलरी थायरॉयड’ कैंसर का पता चला था।

परिवार ने कहा कि परवेज अहमद त्वचा रोग से पीड़ित है और उसके एक हाथ में लकवा भी है। श्रीनगर के मुख्य शहर में एक प्रमुख अस्पताल, शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में परमाणु चिकित्सा विभाग द्वारा जारी परवेज का चिकित्सा प्रमाण पत्र कहता है कि परवेज अहमद जुलाई 2015 से “उच्च खुराक चिकित्सा” (high dose therapy) पर है।

26 अक्टूबर 2018 के सर्टिफिकेट में कहा गया है कि परवेज को नियमित फॉलोअप और बीमारी के लिए अस्पताल मैनेजमेंट के पास नियमित रूप से होना है, लेकिन पिछले दो महीनों से परिवार को उसकी या उसकी स्वास्थ्य स्थिति के बारे में कुछ भी पता नहीं है।

परवेज़ को कड़े सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (PSA) के तहत बुक किया गया था, एक ऐसा कानून जो बिना जमानत के दो साल तक हिरासत में रखने की अनुमति देता है।

धारा 370 के खत्म होने के बाद भारत सरकार ने राजनीतिक नेताओं, अलगाववादियों और सैकड़ों युवाओं को गिरफ्तार किया , जिनमें 144 बच्चे भी शामिल थे, जिसमें कुछ नौ साल की उम्र के भी थे।

आधिकारिक आंकड़े कहते हैं कि गिरफ्तार किए गए लोगों में से कम से कम 350 को PSA के तहत बुक किया गया है, जिनमें से अधिकांश कश्मीर क्षेत्र से बाहर जेलों में भेज दिए गए हैं। कश्मीर के बाहर की जेलों बंद लोगों से परिवारों का मिलना मुश्किल हो गया है। इसमें यात्रा की यात्रा, भारी खर्च और आगे की थका देने वाली कानूनी लड़ाई शामिल है।

‘पता नहीं कि वह मर चुका है या ज़िंदा है’ :

परवेज के परिवार ने कहा कि जब उन्हें पता चला कि परवेज़ उत्तर प्रदेश राज्य के बरेली जिले की एक जेल में है तो वो वहां पहुंचे मगर अधिकारियों ने उनके बीमार बेटे से मिलने की अनुमति से इनकार कर दिया। परवेज अहमद के पिता मुहम्मद अय्यूब पाला कहते हैं कि “मैं 17 अगस्त को उनसे मिलने गया था, लेकिन वहां के जेल अधिकारियों ने अनुमति नहीं दी। मैंने उनसे सिर्फ दवाइयां और कपड़े देने का अनुरोध किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। मैं तीन दिनों की कोशिश के बाद वापस आ गया, मुझे नहीं पता कि वह मर चुका है या जीवित है।”

परवेज़ अहमद पाला की माँ शरीफा।

उन्होंने कहा, “मैं पहले कभी उतर प्रदेश नहीं गया था … मैं एक अनपढ़ आदमी हूं और मेरे साथ एक और आदमी को ले गया, जो शिक्षित है। मुझे उसका खर्च उठाना पड़ा। हम फिर से दोबारा वहां जाने का जोखिम नहीं उठा सकते।” यह कहते हुए वो फूट फूट कर रोने लगा।

उसकी मां शारिफा ने अल जज़ीरा को बताया कि “अगर वह सोने से पहले वो अपनी त्वचा पर दो मरहम नहीं लगाता है, तो और उसकी त्वचा छिलने लगती है, यह उसके लिए बहुत दर्दनाक है। हम उसके बारे में बहुत चिंतित हैं, हम हर समय उसके लिए दुआ करते हुए रोते रहते हैं।”

कुलगाम के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा तैयार एक पुलिस डोजियर ने परवेज को “राज्य की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता के लिए एक बड़ा खतरा” करार दिया।

उस पर आरोप है कि “उग्रवादियों के इशारे पर विषय युवाओं को उकसाने में सक्रिय रूप से भाग लेता है। आप प्रतिबंधित हिजबुल मुजाहिदीन संगठन के जमीनी कार्यकर्ता के सक्रिय कार्यकर्ता होने के नाते, गैरकानूनी गतिविधियों को अंजाम देते हैं ताकि युवाओं को आतंकवादी रैंक में शामिल होने के लिए उकसाया जा सके।”

परवेज के परिवार ने जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की है, जिसमें चिकित्सा आधार पर उसकी नजरबंदी को चुनौती दी गई है। लेकिन उन्हें डर है कि कानूनी लड़ाई बहुत लंबी हो सकती है। अय्यूब ने कहा, “हम सब कुछ करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जब अदालत एक महीने के बाद मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करती है, तो हमें परवेज़ की ज़िन्दगी का क्या यकीन रह जाता है।