रॉबर्ट वाड्रा का कथित बीकानेर जमीन सौदा भाजपा के गले की फांस क्यों बन गया है ?

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स्पेशल स्टोरी : Via –  सत्याग्रह

आज प्रियंका गाँधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा और उनकी माँ को बीकानेर के कोलायत में कथित जमीन घोटाले मामले में जयपुए में ईडी के सामने पेश होना है, ये मामला नया नहीं है, 2013 में हुए विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी और भाजपा के बाकी नेताओं ने रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी द्वारा बीकानेर में जमीन की खरीद-फरोख्त को तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार की मिलीभगत से हुआ बड़ा घोटाला बता कर चुनावी मुद्दा बनाया था|

भाजपा के स्थानीय नेता तो सभाओं में यहां तक कहने से नहीं चूकते थे कि उनकी सरकार आते ही वाड्रा जेल जाएंगे, चुनावों के बाद राजस्थान में भी भाजपा की सरकार बनी और केंद्र में भी, लेकिन जहाँ राजस्थान में पांच सालों में भी भाजपा की वसुंधरा सरकार रॉबर्ट वाड्रा को घेर नहीं पाई वहीँ पौने पांच साल से भी अधिक बीत जाने के बाद भी केंद्र की मोदी सरकार रॉबर्ट वाड्रा को चुनावी वायदे के अनुसार जेल नहीं पहुंचा पाई|

भाजपा के कई बड़े नेताओं ने इस मामलों को खूब उठाया था, रविशंकर प्रसाद ने तो ‘दामाद श्री’ नाम से एक सीडी और बुकलेट भी जारी की थी, विधानसभा और लोकसभा चुनाव के समय नरेंद्र मोदी ने भी इस मामले को खूब हवा दी थी|

इस पूरे प्रकरण की तह में जाते हैं तो साफ हो जाता है कि चुनाव से पहले सत्ता में आते ही रॉबर्ट वाड्रा को जेल भेजने का दावा करने वाली भाजपा सरकार बनने के पौने पांच साल बाद भी इसे पूरा क्यों नहीं कर पाई ?

बीकानेर जिले की कोलायत और गजनेर तहसील में महाजन फायरिंग रेंज के विस्थापित लंबे समय से दूसरी जगह जमीन आवंटित करने की मांग कर रहे थे, तत्कालीन वसुंधरा सरकार ने 2009 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इनकी मांग मानते हुए इनके नाम 1400 बीघा जमीन आवंटित कर दी, उस समय चुनाव में भाजपा की हार हुई और अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने |

2010 में इस 1400 बीघा जमीन में से 275 बीघा जमीन रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी ने स्काइलाइट हॉस्पिटैलिटी ने खरीदी, उस समय स्थानीय सांसद अर्जुन मेघवाल, जो वर्तमान में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री हैं, ने इस मुद्दे को उठाया मगर यह तूल नहीं पकड़ पाया|

2012 में यह मामला उस समय फिर से सुर्खियों में आया जब रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी ने इस जमीन को बेचा, इस खरीद-बिक्री में उन्होंने मोटा मुनाफा कमाया, इसकी वजह थी उस समय की गहलोत सरकार की सौर ऊर्जा नीति, इसके तहत सूबे के रेगिस्तानी इलाकों में बड़ी संख्या में सौर ऊर्जा इकाइयां लगाने का जिक्र था|

इसका नतीजा यह हुआ कि पश्चिमी राजस्थान में जो जमीन कौड़ियों के भाव मिलती थी वह करोड़ों की हो गई, ऐसा होते ही अर्जुन मेघवाल ने इस मुद्दे को न सिर्फ स्थानीय स्तर पर उठाया, बल्कि भाजपा के केंद्रीय नेताओं को भी इसकी जानकारी दी थी|

जब राज्य और केंद्र, दोनों जगह भाजपा की सरकार बन गई तो इस कथित घोटाले की जांच करवाना जरूरी हो गया, राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए बीकानेर कलेक्टर की अध्यक्षता में एक कमेटी बना दी|

कमेटी ने जांच शुरू की तो नया ही घोटाला उजागर हुआ, असल में कई लोगों ने फर्जी कागजात तैयार कर न सिर्फ खुद को महाजन फायरिंग रेंज का विस्थापित बताया, बल्कि राज्य सरकार की ओर से आवंटित 1400 बीघा जमीन में से अपना हिस्सा भी हासिल कर लिया|

इस खेल में भाजपा के भी कई स्थानीय नेता शामिल थे, इनमें से कुछ के नाम कलेक्टर की जांच रिपोर्ट और उसके आधार पर किए गए 18 मुकदमों में भी हैं| हालांकि इनमें से चार मुकदमों में रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी का भी नाम है, लेकिन अब तक की जांच में पुलिस ने कोई भी आरोप प्रमाणित नहीं माना है|

‘यह मामला इतना पेचीदा नहीं था कि इसे स्थानीय पुलिस नहीं सुलझा सके, मामला सुलझा हुआ ही है, लेकिन इसका पटाक्षेप होने से पहले ही जांच सीबीआई को सौंपकर भाजपा इस मुद्दे पर कांग्रेस को घेरे रखना चाहती थी|’

हैरत की बात यह भी है कि वसुंधरा सरकार ने इस मामले की जांच के लिए बीकानेर कलेक्टर की अगुवाई में जो कमेटी बनाई थी, उसकी रिपोर्ट को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया है, सूत्रों के अनुसार कमेटी ने यह माना है कि वाड्रा की कंपनी ने जो जमीन खरीदी वह विस्थापितों द्वारा बेची गई थी, लेकिन कंपनी को इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह इसे बेच नहीं सकती|

अब तक हुई जांच में रॉबर्ट वाड्रा की तो कोई भूमिका सामने नहीं आई, लेकिन यह साफ हो गया है कि फायरिंग रेंज के विस्थापितों को जमीन आवंटन में धांधली हुई, सरकार समूची 1400 बीघा जमीन का आवंटन निरस्त करते हुए इसे अपने कब्जे में ले चुकी है, यहां यह काबिले गौर है कि जमीन आवंटन की पूरी प्रक्रिया वसुंधरा राजे के पिछले कार्यकाल के आखिरी साल यानी 2009 में हुई थी|

ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि चुनाव से रॉबर्ट वाड्रा के जमीन सौदे को भ्रष्टाचार का ‘ओपन एंड शट’ मामला बताने वाली भाजपा सत्ता में आने के बाद अपने आरोप को अंजाम तक क्यों नहीं पहुंचा पाई ?

बीकानेर के वरिष्ठ पत्रकार अनुराग हर्ष बताते हैं, ‘असल में यह मुद्दा भाजपा के लिए गले की फांस बन गया है, चुनाव से पहले पार्टी के नेताओं ने रॉबर्ट वाड्रा पर संगीन आरोप तो लगा दिए, लेकिन सत्ता में आने के बाद वे इन्हें साबित नहीं कर पाए, यह मामला इतना पेचीदा नहीं है कि इसे स्थानीय पुलिस नहीं सुलझा सके. मामला सुलझा हुआ ही है, लेकिन इसका पटाक्षेप होने से पहले ही जांच सीबीआई को सौंपकर भाजपा इस मुद्दे पर कांग्रेस को घेरे रखना चाहती है|’

जहां तक कांग्रेस का सवाल है, उसके लिए तो यह मामला 2010 से ही संकट का सबब बना हुआ है, अपनी तरफ से तमाम तरह की सफाई पेश करने के बावजूद भी आज की स्थिति यह है कि रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ जमीन सौदे की जांच लंबित है| जांच सीबीआई के पास जाने के बाद स्थिति और विकट होना तय है|

प्रदेश कांग्रेस के सचिव आरसी चौधरी कहते हैं, ‘जांच में यह साबित हो चुका है कि भाजपा ने रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ झूठे आरोप लगाए. सीबीआई भी कुछ साबित नहीं कर पाएगी, लेकिन यह आशंका जरूर है कि केंद्र सरकार के इशारे पर जांच के नाम पर वह बेवजह परेशान और चरित्र हनन जरूर करेगी, आखिर में जीत सत्य की ही होगी|’

हालांकि मामले की जांच सीबीआई के पास जाने के बाद कांग्रेस सुरक्षात्मक होने की बजाय आक्रामक हो गई है. पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट का कहना हैं कि, ‘रॉबर्ट वाड्रा और उनकी कंपनियों ने हेराफेरी नहीं की है, अब चुनावी मौसम में भाजपा सरकार सीबीआई जांच के आदेश दे रही है, लेकिन जनता सब जानती है. सीबीआई जांच के नाम पर बेवजह बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है, इस जमीनी मामले को लेकर सरकार ने कमेटी बनाई, लेकिन रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की, चार साल तक सरकार ने कुछ नहीं किया. अब विधानसभा चुनाव नजदीक आते देख यह मामला उठाया जा रहा है. इसमें भाजपा के तीन नेता लिप्त हैं. सरकार उनके बारे में क्यों कुछ नहीं बोलती ?’

(ये लेख सत्याग्रह में 31 अगस्त 2017 में प्रकाशित हुआ था मगर ये आज भी प्रासंगिक है)

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