‘वन फ्री प्रेस’ ने दुनिया के 10 ऐसे पत्रकारों के नाम जारी किये हैं जो सिर्फ सच कहने के खतरे उठा रहे हैं उनमें भारत की भारत की राना अयूब भी हैं।

दुनिया भर में निष्पक्ष रूप से तथ्यों को सामने रखने और दुनिया को सच बताने के लिए विश्व में हज़ारों पत्रकार अपनी जान पर खेल जाते हैं, और इसी कर्तव्य परायणता के जूनून की वजह से दुनिया में कई पात्रकार मार दिए जाते हैं, कइयों को धमकाया डराया या गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया जाता है, म्यांमार में रोहिंग्या पर रिपोर्ट‍िंग के दौरान गोपनीयता भंग करने का आरोप लगाकर वहां की सरकार ने रायटर के दो पत्रकारों वा लोन और क्याव सोए ओ को गिरफ्तार कर सात साल की सजा सुनाई थी।

दुनिया में सच के लिए खतरे उठाते ऐसे जांबाज़ पत्रकारों को सामने लाने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दुनिया के कुछ मीडिया संस्थान पिछले महीने साथ आये और उन्होंने  One Free Press Coalition  ‘वन फ्री प्रेस’ समूह की स्थापना की, ये समूह हर महीने देश और दुनिया के उन 10 ऐसे पत्रकारों के नाम भी जारी करेगा, जो तमाम तरह के हमले का शिकार हैं या मार दिये गये हैं, ‘वन फ्री प्रेस’ ने इसे ’10 मोस्ट अर्जेंट’ का नाम दिया गया है।

‘वन फ्री प्रेस’ की अप्रैल माह की जारी लिस्ट में गुजरात दंगों पर किताब लिखने वाली और स्वतंत्र पत्रकारिता कर रही भारतीय पत्रकार राना अयूब भी शामिल हैं, सबसे अहम् बात ये है कि इन 10 पत्रकारों की लिस्ट में 6 महिलाएं शामिल हैं, इनमें से एक पत्रकार मिरोस्लावा की हत्या हो चुकी है।

‘वन फ्री प्रेस’ की माह अप्रेल की ’10 मोस्ट अर्जेंट’ की सूची इस प्रकार से है :

1. मिरोस्लावा ब्रीच वल्डुसिया (मैक्सिको): मार्च 2017 में राजनेताओं के आपराधिक कृत्यों पर रिपोर्टिंग करने के कारण मैक्सिको के चिहुआहुआ राज्य में ‘ला जोर्नादा’ अख़बार की संवाददाता मिरोस्लावा ब्रीच वल्डुसिया की हत्या कर दी गयी थी. अपनी मौत से पहले, उन्हें अपनी रिपोर्टिंग के कारण कम-से-कम तीन बार धमकियां भी मिल चुकी थीं।

2. मारिया रेसा (फिलीपिंस): मीडिया संस्थान रैपलर और उसकी एडिटर मारिया रेसा को उनके आलोचनात्मक स्वर की वजह से निशाने पर लिया गया है. मारिया को संस्थान से फरवरी में फिलीपिंस की ख़ुफ़िया एजेंसी ने गिरफ़्तार कर लिया था. बाद में उन्हें छोड़ दिया गया, लेकिन संस्थान को तमाम तरह के टैक्स चार्ज का सामना करना पड़ा. बीते 28 मार्च को फिलीपिंस की अथारिटी ने मारिया रेसा सहित संस्थान के अन्य कर्मचारियों के ख़िलाफ़ मीडिया के मालिकाना हक़ संबंधी कानून का उल्लंघन करने के आरोप में अरेस्ट वारंट जारी किया है।

3. ट्रान थी नगा (वियतनाम): वियतनाम की पत्रकार ट्रान थी नगा को “राज्य के खिलाफ प्रोपेगैंडा” करने का आरोप लगाकर नौ साल जेल की सजा सुना दी गयी थी, उन्होंने पर्यावरण और सरकारी भ्रष्टाचार जैसे विषयों पर अधिकारियों की आलोचना करते हुए कई वीडियो प्रोड्यूस किये थे।

4. अज़िमजोन अस्कारोव (किर्गिज़स्तान): मानवाधिकारों के उल्लंघन पर आधारित रिपोर्टिंग के लिए कई अहम पुरस्कार जीत चुके किर्गिज़ पत्रकार अज़िमजोन अस्कारोव को मानवाधिकारों के उल्लंघन संबंधी रिपोर्टिंग के लिए ही उम्र कैद की सज़ा झेल रहे हैं और 9 साल से जेल में हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठी रिहाई की मांग के बावजूद किर्गिज़ अधिकारियों ने उनकी सज़ा को बरकरार रखा है।

5. राना अयूब (भारत): भारतीय पत्रकार राणा अयूब ने भारत में वंचितों, दलितों और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ होनेवाली हिंसा पर काफ़ी रिपोर्टिंग की है और लिखा है. इन सबके कारण राना अयूब दक्षिणपंथी गुटों के हमले का सामना कर रही हैं. उन्हें सोशल मीडिया पर भी उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है. फोटोशॉप शॉप द्वारा अश्लील वीडियो में अयूब का चेहरा जोड़ देना और उनके घर के पते व पर्सनल फोन नंबर को सोशल मीडिया पर सावर्जनिक कर देना, यह भी उनके साथ हुआ है।

6. मिगेल मोरा और लूसिया पिनेदा उबाऊ (निकारागुआ): दिसंबर महीने में, निकारागुआ पुलिस ने मनागुआ प्रांत स्थित टीवी स्टेशन ‘100% नोटिसियस’ पर छापा मारा और स्टेशन डायरेक्टर मिगेल मोरा और न्यूज़ डायरेक्टर लूसिया पिनेदा उबाऊ को गिरफ्तार कर लिया. दोनों पत्रकारों को ‘घृणा और हिंसा’ फैलाने का आरोप लगाकर गिरफ़्तार किया गया. उन्हें किसी भी प्रकार की कानूनी सेवा देने से भी मना कर दिया गया।

7. अन्ना निमिरिआनो (दक्षिण सूडान): जुबा मॉनिटर अख़बार की संपादक अन्ना निमिरिआनो अपने साथियों को रिपोर्टिंग के कारण जेल होने से बाहर रखने के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं. पहले भी सरकार उन्हें अख़बार बंद करने का आदेश दे चुकी है. गिरफ्तारी की धमकी और लगातार सेंसरशिप के बावजूद वे ख़ुद के लिए और अपने सहयोगियों के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं।

8. अमेद अबुबकर (मोजैम्बिक): रेडियो जर्नलिस्ट अमेद अबुबकर को जनवरी महीने में उत्तर के काबो डेलगाडो प्रांत में मिलिटेंट हमले के शिकार परिवारों की तस्वीरें लेने के कारण सेना द्वारा गिरफ़्तार कर लिया गया था. उन्हें बिना किसी ट्रायल के जेल में डालकर छोड़ दिया गया है।

9. क्लॉडिया ड्यूक (कोलंबिया): मानवाधिकारों को लेकर की गयी खोजी पत्रकारिता के लिए क्लॉडिया को किडनैपिंग, ग़ैरक़ानूनी सर्विलांस, मानसिक उत्पीड़न और निर्वासन भी झेलना पड़ा था. उन्हें और उनकी बेटी को टॉर्चर करने के ज़ुर्म में कोलंबिया सुरक्षा सेवा के तीन वरिष्ठ अधिकारियों को सज़ा भी सुनायी गयी है. इंटरनेशनल विमेंस मीडिया फाउंडेशन ने साहसिक पत्रकारिता के लिए क्लॉडिया को साल 2010 के पत्रकारिता सम्मान से भी नवाज़ा था।

10. उस्मान मिरघानी (सूडान): सूडान के उच्च अधिकारियों ने फरवरी में अख़बार ‘अल-तयार’ के प्रधान संपादक मिरघानी को गिरफ्तार कर लिया था. अधिकारियों ने यह भी सार्वजनिक नहीं किया था कि उन पर क्या आरोप लगाये गये हैं. जेल में उनका स्वास्थ्य भी काफी बिगड़ गया था. हालांकि, 29 मार्च को उन्हें रिहा कर दिया गया. मिरघानी गिरफ्तारी से पहले सूडान में चल रहे विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग कर रहे थे।