BBC हिंदी की खबर के अनुसार जलवायु परिवर्तन से चिंतित वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के लिए लंबे वक़्त से गाय की गैस और डकार चिंता के विषय बने हुए हैं, वायुमंडल में हानिकारक मीथेन की अधिक मात्रा के लिए गाय-भैंसों की डकार और उनके पेट से निकलने वाली गैस को भी ज़िम्मेदार माना जाता है।

संयुक्त राष्ट्र की फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइज़ेशन की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार गाय, बकरी और भेड़ जैसे चार पेट वाले जानवर दिन भर खाना चबाते यानी जुगाली करते रहते हैं और डकार मारते हैं।

पहले पेट रूमेन में लाखों की संख्या में जीवाणु रहते हैं जो घास और पत्तियों जैसे फाइबर युक्त खाने को छोटे टुकड़ों में तोड़ कर उन्हें हज़म करना आसान बनाते हैं. इस प्रक्रिया में गाय के पेट से मीथेन गैस निकलती है।

नवंबर 2006 में आई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार कार्बन डाईऑक्साइड का जितना उत्सर्जन गाड़ियों या कारखाने के धुंए से होता है उससे कहीं अधिक गाय के पेट से होता है. इस रिपोर्ट के अनुसार वायुमंडल को सबसे अधिक ख़तरा गाय और भैसों से है।

कारों से कार्बन डाईऑक्साईड का उत्सर्जन होता है जबकि गाय से मीथेन का. और कार्बन डाईऑक्साईड के मुक़ाबले मीथेन हमारे वायुमंडल के लिए कई गुना हानिकारक है. ये ग्रीनहाऊस गैसों को अधिक मात्रा में बांध कर रखती है और यह ग्लोबल वार्मिंग का बड़ा कारण है।

न्यूज़ीलैंड ने तो गाय-भैसों की गैस पर टैक्स लगाने का भी प्रस्ताव दे दिया था. किसानों ने इसका जमकर विरोध किया, लेकिन इस प्रस्ताव ने जलवायु परिवर्तन और गाय-भैंसों के योगदान को ज़रूर स्पष्ट कर दिया।

मीथेन का उत्सर्जन कम करने की कोशिशों को इसी बात से जाना जा सकता है 2016 में कैलिफ़ोर्निया में गायों से निकलने वाली मीथेन को गाड़ियों में इस्तेमाल करने की कोशिशों की बातें होने लगीं थी।

एशियन ऑस्ट्रेलियन जर्नल ऑफ़ एनिमल साइंसेज में 2014 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार 2010 तक गायों के कारण मीथेन उत्पादन की मात्रा लगातार बढ़ी है और दुनिया के अन्य हिस्सों में पाई जाने वाली गायों की तुलना में भारतीय गाय इसमें आगे हैं।

2012 में हुई 19वें पशुधन गणना के अनुसार भारत में क़रीब 51 करोड़ गाय, भैंसे, बकरी, भेड़ें और घोड़े हैं।

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