कभी एजुकेशन हब के नाम से भारत के मानचित्र पर अपनी पहचान बनाने वाले राजस्थान के कोटा शहर का नाम अब कोचिंग छात्रों की आत्महत्याओं की वजह से चर्चा में आने लगा है, 2018 के दिसंबर माह के अंतिम सप्ताह में ही तीन कोचिंग छात्रों ने आत्महत्या कर डाली।

सफलता की कहानियां लिखने और कोचिंग सिटी या एजुकेशन हब कहें जाने वाले कोटा शहर के लोग अब छात्रों की आत्महत्याओं की ख़बरों से सहमे हुए हैं। राजस्थान के कोटा में IIT-JEE की तैयारी कर रहे जितेश गुप्ता नाम के एक छात्र का शव उसके हॉस्टल के कमरे में मिला। उसने पंखे की मदद से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।

बीते तीन दिनों के अंदर यहां कोचिंग संस्थानों में तैयारी कर रहे छात्र के आत्महत्या करने का यह तीसरा मामला है। वहीं जनवरी से लेकर अब तक  यहां 19 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। हर साल औसतन 25 कोचिंग छात्र छात्राएं अपनी ज़िंदगियाँ ख़त्म करते हैं।

इसके बावजूद कोटा शहर की सड़कों और चौराहों पर आकर्षक होर्डिंग्स इन आत्महत्या करते छात्रों की वजहों को छुपाते और लुभाते नज़र आते हैं, ये बात भी सही है कि कोटा के इंजीनियरिंग और मेडिकल कोचिंग का झंडा प्रतियोगी परीक्षाओं में बुलंद रहता है, इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रतियोगी परीक्षाओं में टॉप दस में से पांच छात्र कोटा के आते हैं।

मगर डॉक्टर इंजीनियर बनने और भविष्य के सपने बुनने के बीच एक ऐसा गेप पनपने लगा है जिसे भरने में कोचिंग पुलिस और स्थानीय प्रशासन असहाय है, इसी गेप की भेंट हर साल बीस तीस स्टूडेंट्स चढ़ जाते हैं, ख़बरें दो दिन सुर्ख़ियों में रहती हैं फिर हाशिये पर चली जाती हैं, बच्चों के माता-पिता रोते बिलखते आते हैं, और अपने बच्चों की लाशें ले जाते हैं।

आखिर क्या वजह है कि कोचिंग छात्र आत्महत्याएं करने लगे या करते हैं ? इसके वैसे तो बहुत से कारण और पहलू हैं, जिन पर एक किताब लिखी जा सकती है, इसका बड़ा कारण मनोवैज्ञानिक है, और दोषी भी कोचिंग से ज़्यादा छात्रों के अभिभावक हैं।

इसी का सबसे मार्मिक घटना हुई थी साल 2016 में जब एक 17 वर्षीय कोचिंग छात्रा कृति त्रिपाठी ने आत्महत्या करने से पहले मां-बाप, कोचिंग संस्थान से लेकर मानव संसाधन मंत्रालय और भारत सरकार तक को बताया था कि वो क्यों मर रही है और यहां के कोचिंग छात्र क्यों मर रहे हैं।

कृति ने अपने  सुसाइड नोट में लिखा था कि :” मैं भारत सरकार और मानव संसाधन मंत्रालय से कहना चाहती हूं कि अगर वो चाहते हैं कि कोई बच्चा न मरे तो जितनी जल्दी हो सके इन कोचिंग संस्थानों को बंद करवा दें. ये कोचिंग छात्रों को खोखला कर देते हैं. पढ़ने का इतना दबाव होता है कि बच्चे बोझ तले दब जाते हैं.’ कृति ने लिखा है कि वो कोटा में कई छात्रों को डिप्रेशन और स्ट्रेस से बाहर निकालकर सुसाईड करने से रोकने में सफल हुई लेकिन खुद को नहीं रोक सकी. ‘बहुत लोगों को विश्वास नहीं होगा कि मेरे जैसी लड़की सुसाइड भी कर सकती है, लेकिन मैं आपलोगों को समझा नहीं सकती कि मेरे दिमाग और दिल में कितनी नफरत भरी है|’

अपनी मां के लिए उसने लिखा- ‘आपने मेरे बचपन और बच्चा होने का फायदा उठाया और मुझे विज्ञान पसंद करने के लिए मजबूर करती रहीं. मैं भी विज्ञान पढ़ती रहीं ताकि आपको खुश रख सकूं. मैं क्वांटम फिजिक्स और एस्ट्रोफिजिक्स जैसे विषयों को पसंद करने लगी और उसमें ही बीएससी करना चाहती थी लेकिन मैं आपको बता दूं कि मुझे आज भी अंग्रेजी साहित्य और इतिहास बहुत अच्छा लगता है क्योंकि ये मुझे मेरे अंधकार के वक्त में मुझे बाहर निकालते हैं.’ कृति अपनी मां को चेतावनी देती है कि- ‘इस तरह की चालाकी और मजबूर करनेवाली हरकत 11 वीं क्लास में पढ़नेवाली छोटी बहन से मत करना. वो जो बनना चाहती है और जो पढ़ना चाहती है उसे वो करने देना क्योंकि वो उस काम में सबसे अच्छा कर सकती है जिससे वो प्यार करती है|’

कोटा में सन 2000 से लेकर 2016 तक 283 कोचिंग छात्रों ने आत्महत्या की थी, और ये दुखद क्रम अनवरत जारी है, कुछ बच्चे अपनी माता पिता की महत्वकांक्षाओं की भेंट चढ़ते हैं, तो कुछ बच्चे औसत होते हुए भी कोचिंग के लिए धकेल दिए जाते हैं, तो कुछ बच्चे पढाई में कमज़ोर होने के बाद माता पिता की कमज़ोर आर्थिक स्थिति और कोचिंग के बढ़ते खर्चों की चिंता में अपनी ज़िन्दगी ख़त्म कर लेते हैं।

सबसे बड़ा पक्ष ये भी है कि कोटा शहर की कोचिंग की लुभावनी उपलब्धियों की चका चौंध से आकर्षित होकर हर साल हर दर्जे के हर राज्य के हज़ारों बच्चे बच्चियां यहाँ आते हैं, कुछ को माता पिता कृति त्रिपाठी की तरह ज़बरदस्ती लाते हैं, जो यहाँ आते तो ज़िंदा हैं, मगर घर उनकी लाशें ही जाती हैं।

इसलिए कोचिंग वालों स्थानीय प्रशासन और नवागुंतक अभिभावकों को ये चाहिए कि कोचिंग छात्रों की इन बढ़ती और लगातार जारी आत्महत्याएं रोकने के लिए एक कार्य योजना बनाई जाए जिस पर सभी को अमल करना ज़रूरी हो, इसमें कोचिंग छात्रों के एडमिशन के मानकों से लेकर बाद की कोचिंग के रूप रेखा, होस्टल्स को नियमों के दायरे में बांधने के साथ साथ अभिभावकों द्वारा नियमित अपने बच्चों की कॉउंसलिंग जो कि बहुत ही ज़रूरी है, सर्व मान्य तरीके से लागू हो ताकि हर साल अपनी जीवन लीला ख़त्म करते इन बच्चों की मौतों का सिलसिला खत्म हो सके।