तीन तलाक़ बनाम वृन्दावन की विधवाएं।

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मोदी सरकार मुस्लिम महिलाओं के कथित पारिवारिक, सामाजिक उत्थान जीत या सशक्तिकरण के लिए तीन तलाक़ पर विधेयक के लिए टूटी पड़ी है, ऐसा लगने लगा है जैसे देश का सबसे बड़ा मौलिक मुद्दा मुसलमानों की तीन तलाक़ प्रथा ही है।

मुस्लिम महिलाओं से ज्यादा हिंदू महिलाएं तमाम तरह के अत्याचार सहन करते हुए नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त हैं, सरकार उनके लिए क्या कर रही है? देश के तमाम धार्मिक आश्रमों, स्वंय सेवी संस्थाओं या सरकार संचालित आश्रय गृहों में महिलाओं की हालत खराब है। सदियों से मंदिरों में देवदासी बना कर महिलाओं का शोषण किया गया है। वृंदावन के विधवा आश्रमों के नारकीय जीवन पर दशकों से बहुत कुछ लिखा, कहा गया है।

पहले बात तीन तलाक़ पर हुए खेल की करते हैं, National Herald में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार भारत की कुल आबादी के 14 % हिस्से की आधी आबादी यानि मुस्लिम महिलाओं को दिए जाने वाले तलाक़ों में तीन तलाक़ के केस कुल तलाक़ों का केवल 1% ही है, वहीँ 2011 की जनगणना के अनुसार मुसलमानों में तलाक़ों की संख्या 0.56% थी जबकि हिन्दुओं में ये प्रतिशत 0.76% था।

वहीँ मुसलमानों में तीन तलाक़ के मामलों के आंकड़े न तो सरकार के पास थे, ना ही लॉ कमीशन ने ही ऐसे सर्वे कराये जिससे कि आधिकारिक आंकड़े सामने आ सकें, मोदी सरकार ने मुसलमानों में तीन तलाक़ के आंकड़ों के साथ किस तरह गेम खेला है इसे नेशनल हेराल्ड ने बखूबी पेश किया है, भाजपा की ही विंग ‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ (BMMA) ने ही अपने तौर पर दावा किया था कि तीन तलाक़ों का प्रतिशत 11% है, जो कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों के विपरीत है।

‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ (BMMA) ने अपने ही तौर पर मुस्लिम महिलाओं के बीच दो सर्वे किये थे, पहला सर्वे 10 राज्यों में 4710 मुस्लिम महिलाओं के बीच और दूसरा सर्वे 8 राज्यों की 117 मुस्लिम महिलाओं के बीच, इसी सर्वे को आधार बना कर मोदी सरकार तीन तलाक़ बिल लाने को आतुर हो गयी।

आखरी बात इस इंस्टेंट तलाक़ पर आये फैसले और सरकार की नियत की तो इस ट्रिपल तलाक़ मुद्दे को मोदी सरकार ने मीडिया, अपने कुछ संगठनों के ज़रिये एक सुनियोजित रणनीति के तहत उछाल कर मुद्दा बना कर राजनैतिक हित उत्तरप्रदेश चुनाव में साधे थे !

यदि मोदी सरकार को मुस्लिम महिलाओं की इतनी चिंता है तो उन्हें इस बात पर भी गौर करना होगा कि केवल इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश जारी करा देने से 20 करोड़ की आधी आबादी यानि मुस्लिम महिलाओं का उत्थान नहीं होने वाला, ना ही उनका सामाजिक जीवन सुधरने वाला, ये तभी संभव है जब मोदी जी समग्र मुस्लिम समुदाय के लिए ही ऐसी चिंता करें, और उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए कोई ठोस नीति बनाएं।

बात अगर पीड़ित मुस्ल्मि महिलाओं की आती है तो गुमशुदा नजीब की माँ भी पीड़ित महिला है, दादरी के अख़लाक़ की बेवा भी मुस्लिम महिला है, बहरोड़ में मॉब लिंचिंग का शिकार हुए पहलू खान की अंधी माँ और उसकी बेवा बीवी, ट्रैन में मारे गए जुनैद की माँ भी पीड़ित मुस्लिम महिला है और हाल ही में मारे गए रकबर खान की बेवा भी एक मुस्लिम महिला है।

इसलिए इस इंस्टेंट तलाक़ को मुस्लिम महिलाओं की जीत, सामाजिक उत्थान, सशक्तिकरण या फिर मोदी सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धि जैसे अलंकारों से अलंकृत करने के बजाय मूल में जाकर देखेंगे तो एक राजनैतिक हितसाधन का प्रयास ही नज़र आएगा।

ऐसा भी क्या मुस्लिम प्रेम कि आप अपने ही धर्म की महिलाओं की दयनीय स्थिति भूल गए ? देश में दहेज़ के लिए आये दिन जला दी गयी बेटियों, बलात्कार कर मार कर फेंक दी गयी बेटियों को भूल गए और भूल गए वृन्दावन की उन हज़ारों विधवाओं को जिनकी वजह से वृन्दावन को विधवाओं का शहर (Vrindavan: The city of widows) कहा जाता है।

जहाँ हर तीन में से एक विधवा है, एक Report के अनुसार मथुरा और वृन्दावन में 15000 से 20 हज़ार विधवा महिलाएं रहती हैं जो भीख मांगती हैं और इनमे से कई का यौन शोषण भी होता है.,सरकारी एवं निजी आश्रम विधवाओं के लिए जेल बन चुके हैं. आश्रम की छोटी-छोटी सीलन भरी कोठरियों में तीन-चार विधवाएं एक साथ रहने के लिए मजबूर की जाती हैं। इनमें 18 वर्ष से लेकर 90 वर्ष तक की विधवाएं शामिल हैं।

नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी नाम के एक गैरसरकारी संगठन ने इन विधवाओं की दयनीय स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. इस संस्था ने वृंदावन की विधवाओं का सर्वे किया, इसके मुताबिक 1739 विधवाओं की स्थिति बेहद दयनीय है. इनमें से करीब 200 तो वास्तव में सड़कों पर रह रही हैं। इसी सर्वे को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डी के जैन और जस्टिस मदान बी लोकुर की बेंच ने यूपी सरकार और मथुरा के जिला प्रशासन की कड़ी फटकार लगाते हुए इन विधवाओं को खाना, चिकित्सा सेवा, रहने के स्थान और उनके अंतिम संस्कार का इंतजाम करने का आदेश दिया था।

इस संगठन के मुताबिक वृंदावन में चल रहे चार सरकारी विधवा आश्रम की हालत बेहद खस्ता है. न वहां खाना है न रहने की जगह. वहां के प्रबंधक इन विधवाओं से भीख मंगवाते हैं. सूत्र बताते हैं कि यहां का खाना इतना घटिया होता है कि बेसहारा विधवाएं भी इसे खा नहीं सकतीं. इससे अच्छा खाना तो उन्हें भीख में मिल जाता है।

विधवाओं की ये बढ़ती भीड़ किस कुप्रथा की देन है ? क्यों इस पर संज्ञान नहीं लिया जा रहा ? यहाँ तक कि 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने वृन्दावन की विधवाओं के मामले पर संज्ञान लेते हुए सवाल उठाया था कि कैसे 18 साल से कम उम्र की महिलाओं की शादी हो रही है और विधवा होने पर घर से दूर कर दी जाती हैं? सुप्रीम कोर्ट ने तब उत्तर प्रदेश सरकार से इस पर जवाब दाखिल करने को कहा था।

एक गैर सरकारी संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की थी जिसमें इन विधवा महिलाओं की खराब स्थिति की ओर कोर्ट का ध्यान खींचा था, याचिका में कहा गया था कि वृंदावन में विधवा महिलाओं की स्थिति बेहद दयनीय है और कोर्ट उनके हालत बेहतर बनाने के लिए ज़रूरी निर्देश जारी करे, याचिका में ये भी कहा गया था की ये विधवाएं घंटों भजन गाती हैं और इसके लिए 18 रुपये मेहनताने के तौर पर दिए जाते हैं।

वृन्दावन की इन विधवाओं की इस बढ़ती भीड़ या इस कुप्रथा पर रोक लगाने के लिए कोई के लिए कोई रोडमैप बनाने, ठोस क़दम उठाने के बजाय भाजपा सांसद हेमामालिनी ने 17 सितम्बर, 2014 को यह अविवेकपूर्ण टिप्पणी करके इन विधवाओं के घावों पर और नमक छिड़क दिया था कि “‘‘वृंदावन की विधवाएं आदतन भीख मांगती हैं। यहां पहले ही 40 हजार से अधिक विधवाएं हैं और इससे अधिक के रहने के लिए यहां जगह नहीं है। विधवाओं की देखभाल करने की जिम्मेदारी उनके राज्यों की होनी चाहिए। यू.पी. के पवित्र शहर वृंदावन में भीड़ नहीं बढ़ानी चाहिए। यदि वे (विधवाएं) यहां की नहीं हैं तो अन्य राज्यों से उन्हेंयहां आने की कोई जरूरत नहीं।’’

आज यही पार्टी और इसकी सँसद महिलाएं तीन तलाक़ बिल पर प्रवचन और तर्क देती नज़र आ रही हैं तो अफ़सोस हो रहा है, अफ़सोस इस बात का कि नियत एजेंडे को पूरा करने और मुस्लिम समाज को हैरान परेशान करने में इतने व्यस्त हैं कि अपने ही धर्म की हज़ारों विधवाओं, जलती बेटियों और बलात्कारों में मरती बेटियों की रत्ती भर भी चिंता नहीं है|

इस देश की बड़ी आबादी की आधी आबादी यानी महिलाएं भी मुस्लिम महिलाओं की तरह ही अपना पारिवारिक, सामाजिक उत्थान चाहती हैं सशक्तिकरण चाहती हैं न्याय चाहती हैं, मगर अफ़सोस इस सरकार की इस साजिश का खामियाज़ा इतनी बड़ी आबादी को चुकाना पड़ रहा है।

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