गौरक्षा का बड़ा साइड अफेक्ट : सड़क पर टहलती ‘आवारा मौत’ की वजह से बेमौत मरते सैंकड़ों लोग।

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देश में आवारा मवेशियों की वजह से हुए रोड एक्सीडेंट्स में औसतन हर साल 500 लोग मारे जा रहे हैं

गौरक्षा पॉलिटिक्स का ड्रामा 2014 से देश में जारी है, जनसत्ता की खबर के अनुसार 8 साल में गौरक्षा के नाम पर हिंसा में मरने वाले 86 % मुस्लमान थे और 97 % हिंसा की घटनाएं मोदी राज में हुईं, रिपोर्ट का दावा है कि इस दौरान गोवंश से जुड़ी हिंसा के मामलों में मारे गए 28 लोगों में से 24 मुसलमान (करीब 86 प्रतिशत) थे। इन घटनाओं में 124 लोग घायल हुए थे। गाय से जुड़ी हिंसा के आधे से ज्यादा मामले (करीब 52 प्रतिशत) झूठी अफवाहों की वजह से हुए थे।

 

वेबसाइट ने जानकारी दी है कि गाय से जुड़ी हिंसा के 63 मामलों में 32 बीजेपी शासित राज्यों में दर्ज किए गए। आठ मामले कांग्रेस शासित प्रदेशों में हुए। बाकी मामले दूसरी पार्टियों द्वारा शासित प्रदेशों में हुए।

गौरक्षकों ने गायों को बचाने के लिए विगत सालों में जहाँ 25 लोगों को मौत की घाट उतार डाला, वहीँ इस गौरक्षा पॉलिटिक्स का एक और चिंतनीय पहलू भी उभर कर सामने आया है। इन आवारा छोड़ दी गयी गायों भैंसों और सांडों की वजह से आये दिन शहरों में , सड़कों पर और राष्ट्रिय राजमार्गों पर लोगों की मौतों का आंकड़ा भयंकर रूप से बढ़ गया है।

Indian Express की खबर के अनुसार 2015 में ही 550 से ज़्यादा लोग इन आवारा मवेशियों की वजह से असमय ही मौत के मुंह में चले गए, पंजाब गौ सेवा समिति (PGSC) के अनुसार अकेले पंजाब में ही 30 माह में 300 के लगभग लोग मवेशियों के कारण हुए रोड एक्सीडेंट्स में मारे गए।

वहीँ केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के मुताबिक अकेले पंजाब में ही 2016 के दौरान आवारा पशुओं की वजह से सड़क दुर्घटनाओं में 38 प्रतिशत की भयंकर बढ़ोतरी हुई है।

वहीँ इन मौतों पर सरकारी वेब साइट ने 2014 यानी मोदी सरकार के आने के बाद से आंकड़े जारी नहीं किये हैं, चाहें तो इस  LINK पर चेक कर सकते हैं।

देश के ज्यादातर राज्य अपने यहां मुख्य सड़कों और राजमार्गों पर घूमते आवारा गायों और सांडों से उत्पन्न खतरों को झेल रहे हैं । यह संकट इतना ज्यादा बढ़ गया है कि रात के समय सड़कों पर होने वाली ज्यादातर दुर्घटनाएं आवारा पशुओं की वजह से ही हो रही हैं।

ऐसे हादसों में राजस्थान में हर साल 20-25 लोगों की मौत हो जाती है। इतना ही नहीं इन हादसों में 100 से ज्यादा पशुओं की भी मौत हो गई। इस तरह की घटनाओं में राजस्थान का देश में सातवां स्थान है। पशुओं के कारण जान गंवाने वालों में जयपुर संभाग सबसे ऊपर है।

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, देश में 19 करोड़ से ज्यादा गोवंश पशु हैं जिनमें 18 करोड़ गोवंश पशु ग्रामीण इलाकों में हैं जबकि 70 लाख पशु शहरी क्षेत्रों में रहते हैं । गायें जब दूध देना बंद कर देती हैं तो गावों और शहरों में किसान अपनी गायों को सड़कों पर छोड़ देते हैं।

आए दिन राजमार्गों में होने वाले इन हादसों को आधिकारिक रिकार्ड नहीं है। हाईवे पर सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं छुट्टा जानवरों को बचाने या उनके अचानक बीच में आ जाने के कारण होते हैं, लेकिन इन हादसों का पुलिस के पास कोई रिकार्ड नहीं है। इन एक्सीडेंट्स में जहाँ कई बार कुछ आवारा मवेशियों की जान जाती है वहीँ इनसे ज़्यादा इंसानी मौतों का आंकड़ा भी बढ़ता है।

गौरक्षा पॉलिटिक्स की वजह से बूचड़खानों पर पाबंदी और केंद्र के पशुओं की ख़रीद बिक्री संबंधी क़ानून पास होने और गौ रक्षकों के आतंक के बाद कई राज्यों में गाय, बैल, बछड़ों की ख़रीद बिक्री एकदम बंद हो गई है, लोग इसके परिवहन से डरने लगे हैं, अब लोगों के पास जो भी जानवर काम के नहीं होते, लोग अब बेच नहीं पाने के कारण उन्हें खुला छोड़ रहे हैं, यही आवारा मवेशी सड़कों पर काल बन कर लोगों की ज़िंगगियां छीन रहे हैं।

गौ रक्षा करनी है तो पूरी तरह से और अंतिम चरण तक कीजिये, ये कैसी गौरक्षा है कि दूध देना बंद करते ही उसे सड़क पर आवारा छोड़ दिया जाए ? और सड़कों पर वो आमजन के लिए वो काल बन जाए, गौ पॉलिटिक्स के रथ पर सवार वोटों की फसल काटती सरकार के पास इन चिंतनीय हालातों के बाद भी कोई ठोस कार्य योजना नहीं है कि वो सड़कों पर इन आवारा मवेशियों पर रोक लगाए और असमय मौत के मुंह में जाने वाले बेक़ुसूर इंसानी ज़िंदगियाँ बचाये।

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