बुधवार को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने आतंकी संगठन आईएसआईएस के कथित मॉड्यूल ‘हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम’ का पर्दाफाश करने का दावा कर उत्तर प्रदेश और दिल्ली में 17 जगहों पर छापेमारी कर एक मुफ्ती सोहेल सहित 10 लोगों को गिरफ्तार किया है।

उनसे बरामद आपत्तिजनक सामानों, विस्फोटकों, सुतली बम, और राकेट लांचर आदि को लेकर सोशल मीडिया पर तरह तरह की चर्चाएं जारी हैं, वहीँ गिरफ्तार किये गए लोगों के परिजन भी इन गिरफ्तारियों के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं।

ये पहली बार नहीं है जब मुस्लिम नौजवानों को इस तरह से उठाया गया है, ऐसे केसों में से अधिकांश लोग दस बीस साल बाद अदालतों से ‘बेगुनाह’ साबित होकर बाहर निकले हैं, इसका सबसे बड़ा उदाहरण था गुलबर्गा, कर्नाटक के फार्मेसी सेकेंड ईयर का स्टूडेंट निसार जिसे 23 साल जेल में रहने के बाद मई 2016 को रिहा किया गया, उन्हें 5 जनवरी, 1994 को उनके घर से हैदराबाद पुलिस ने उठाया था।

निसार उन तीन लोगों में से एक हैं जिन्‍हें सुप्रीम कोर्ट ने सभी आरोपों से बरी कर दिया था। देश की सबसे बड़ी अदालत ने उन्‍हें सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द किया और 11 मई को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। तीनों को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की पहली बरसी पर हुए ट्रेन बम धमाकों के सिलसिले में उठाया गया था !

यह उन सैंकड़ों मामलों में से एक है जो बाबरी मस्जिद के शहीद होने के बाद चले एक ट्रेंड के तहत गिरफ्तार किये गए, और दस बीस सालों बाद बेगुनाह साबित होने के बाद रिहा किये गए, और इन रिहाइयों से पहले और बाद इनके पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक जीवन पूरी तरह से नष्ट हो गए।

आजतक.इंडियाटुडे ने ऐसे मामलों पर अपनी एक तथायत्मक रिपोर्ट विस्तार से पेश की थी, आईये ऐसे ही कुछ और मामलों पर नज़र डालते हैं :-

मामला 27 अक्तूबर 2015 का है जब बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी बिहार की राजधानी पटना में हुंकार भरने वाले थे. लेकिन गांधी मैदान में एक के बाद एक कई बम धमाके हुए, बीजेपी ने इसका सियासी फायदा उठाया तो राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) समेत कई राज्यों की पुलिस वारदात को अंजाम देने वालों की धर-पकड़ में जुट गई।

एनआइए ने बिहार से सटे झरखंड की राजधानी रांची में दबिश दी तो कथित तौर पर संदिग्ध फरार हो गए. उन्हें पकडऩे का दावा बीजेपी शासित राज्य छत्तीसगढ़ की पुलिस ने किया, उसने सिमी के कुल 16 संदिग्धों को गिरफ्तार किया, लेकिन 24 मार्च को स्थानीय अदालत ने उनमें से 14 संदिग्धों को जमानत दे दी। इस मामले ने एक बार फिर से यह बहस छेड़ दी है कि आखिर मुसलमानों को ही पुलिस राष्ट्रविरोधी मामलों में क्यों गिरफ्तार करती है, जब उसके पास अदालत में साबित करने का कोई आधार ही नहीं होता ?

पटना में मोदी की हुंकार रैली में हुए धमाकों के सिलसिले में सिमी के जिन 16 संदिग्धों को पिछले साल रायपुर पुलिस ने गिरफ्तार किया, उन पर उसने देशद्रोह जैसे गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन उसे साबित करने का आधार उसे 90 दिन में भी नहीं मिल पाया, ऐसे में सवाल उठता है कि पुलिस ने संदिग्धों को सिमी का सदस्य बताकर गिरफ्तार किया और उन पर ढेर सारे इलजाम लगा दिए, लेकिन वह उसे साबित करना तो दूर, अदालत में चार्जशीट तक पेश नहीं कर पाई।

अब सवाल उठता है कि पुलिस ने 16 लोगों पर इतने गंभीर आरोप किस आधार पर लगाए थे? इनमें से अधिकांश युवा थे, उन पर अगर वाकई कोई आधार था तो पुलिस उसे कानून की ओर से तय मियाद में कोर्ट के सामने क्यों नहीं रख पाई थी ? मामला इसलिए भी संदेह पैदा करता है क्योंकि छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार थी और पुलिस के आरोपों को ही लें तो पकड़े गए संदिग्धों में से कई सीधे तौर पर बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को निशाना बनाना चाह रहे थे।

ऐसे बेगुनाह युवक जब घर लौटते हैं तब तक उनकी दुनिया उजड़ चुकी होती है और समाज उन्हें शक की निगाह से देखता है, जबकि वही पुलिसवाला कभी पदोन्नति तो कभी बहादुरी का मैडल अपने सीने पर लगाए फूला नहीं समाता. लेकिन उन बेगुनाहों की जेल की सलाखों के पीछे गुजरी जिंदगी को कोई लौटा नहीं सकता।

दिल्ली-गाजियाबाद बम ब्लास्ट के मामले में 1996 में गिरफ्तार मोहम्मद आमिर खान को 14 साल बाद कोर्ट ने बरी कर दिया. उसकी दुनिया अब बदल चुकी है, आमिर अपनी कहानी कुछ यूं सुनाते हैं. ‘‘जब मैं बच्चा था तो पिंजरे वाली गाड़ी (कैदियों को लाने वाली गाडिय़ां) देखकर चिल्लाता था…चोर…चोर…मुझे उसमें बंद सभी कैदी चोर नजर आते थे, लेकिन जब खुद उसमें बंद हुआ तो महसूस हुआ, नहीं, पिंजरे में निर्दोष भी होते हैं।’

चेहरे पर फीकी मुस्कान के साथ इस वाक्य को कहते हुए 32 वर्षीय आमिर खान की आंखें अचानक बेडिय़ों के भीतर बीती जिंदगी की कहानी बयान करने लग जाती हैं. कैसे महज 18 साल की उम्र में दिल्ली पुलिस ने उसे सीरियल बम धमाकों के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था. कैसे उसने भविष्य संवारने वाली अपनी उम्र के 14 साल जेल की सलाखों के पीछे काटे और आखिर में कोर्ट ने उसे निर्दोष मानते हुए बरी कर दिया. कैसे बच्चे-बच्चे के हाथ में होने वाला मोबाइल फोन आमिर के लिए अजूबा है, जिसे उसने जेल से रिहा होने के बाद अपने भांजे-भांजियों से चलाना सीखा है।

इन 14 साल में उसकी दुनिया उजड़ चुकी है, पिता हाशिम खान बेटे की गिरफ्तारी के तीन साल बाद समाज के बहिष्कार और न्याय की आस छोड़कर दुनिया से चल बसे, तो दशक भर की लड़ाई के बाद 2008-09 में आखिर आमिर की मां की हिम्मत भी जवाब दे गई और वे सदमे से लकवाग्रस्त हो गईं। आमिर कहते हैं, ‘‘आज भी अपनी वालिदा के मुंह से बेटा शब्द सुनने को तरसता हूं.’’ कानून की चक्की में पिसा आमिर अब एलएलबी की पढ़ाई कर वकील बनना चाहता है ताकि जेल में बंद निर्दोष लोगों के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ सके।

इस लेख में एक फैसला मालेगांव विस्फोट का भी शामिल कर लेते हैं, जिसमें मालेगांव विस्फोट में महाराष्ट्र ATS द्वारा पकडे गए बेगुनाह सभी 9 लोगों को 10 साल बाद मुंबई की एक स्पेशल कोर्ट ने सबूत के अभाव में बरी कर दिया, जबकि एक आरोपी शब्बीर अहमद की पिछले साल मौत हो गई थी।

अक्षरधाम मंदिर हमले में पकडे गए और 11 साल बाद बा इज़्ज़त बरी हुए मुफ़्ती अब्दुल क़य्यूम के अलावा भी देश में सैंकड़ों ऐसे उदाहरण हैं जिसमें मुसलमानो को संदेह के आधार पर ही उठाकर जेलों में ठूंस दिया गया है, और जिन्हे अपनी बेगुनाही साबित करने में दशकों लग गए हैं।

अस्सी के दशक में गुजरात के बंदरगाह मंत्री रहे 78 वर्षीय मोहम्मद सूरती के चेहरे पर अपने ऊपर हुए जुल्म की कड़वी कहानी सुनाते वक्त दर्द और अफ सोस उतर आया है. अपने दो मंजिला घर में मक्का की तस्वीर के सामने बैठे सूरती कभी कांग्रेस के कद्दावर नेता थे।

उन्हें बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद भड़के दंगों के बाद 1993 में सूरत में हुए दो बम विस्फोटों की साजिश रचने वाले 11 आरोपियों में शामिल किया गया. 2008 में टाडा अदालत ने इन्हें जेल की सजा सुनाई थी. 1995 में उन्हें उस अपराध का आरोपी ठहराया गया था. 19 साल की अदालती कार्रवाई और 12 साल तक जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 18 जुलाई को उन्हें बरी कर दिया।

बेशक उन्हें चैन है कि वे निर्दोष साबित हुए, लेकिन कुछ सवाल उनके मन को मथ रहे हैं ”हमारे वे 12 साल कौन लौटाएगा? पिछले दो दशक से हम और हमारा परिवार आतंकवादी होने का कलंक झेल रहा था, अब उसके निशान कौन मिटाएगा?” क्या कानून-व्यवस्था यह आश्वासन दे सकती है कि कम-से-कम इस तरह के गंभीर मामलों से जुड़ी अदालती कार्रवाई को लंबे समय तक न खींचा जाए ?

आमिर ही नहीं, पेशे से डॉक्टर महाराष्ट्र के 35 वर्षीय रईस अहमद को मालेगांव मस्जिद धमाके में 2006 में एटीएस ने गिरफ्तार किया. साथ में शहर के अन्य आठ लोगों को साजिश रचने के मामले में गिरफ्तार किया गया. लेकिन जब एनआइए ने इन लोगों की रिहाई का विरोध नहीं करने का फैसला किया तो पांच साल बाद मकोका अदालत ने छोड़ दिया. लेकिन जब 16 नवंबर, 2011 को वे रिहा हुए तो उन्हें मालूम पड़ा कि उन लोगों ने क्या खो दिया है. मतदाता सूची से उनके नाम काट दिए गए थे, परिवार को मानसिक यातनाओं से गुजरना पड़ा. परिवार में कोई रोजगार नहीं था. यूपी के रामपुर के रहने वाले 35 वर्षीय जावेद अहमद 11 साल तो कानपुर के वासिफ हैदर को बेगुनाह होने के बावजूद 9 साल जेल में बिताने पड़े।

बिजनौर के 32 वर्षीय नासिर हुसैन को 22 धमाकों का मास्टरमाइंड बताया गया लेकिन 14 साल के बाद वह निर्दोष साबित हुआ. युवा मकबूल शाह को अपनी जिंदगी के 14 साल तिहाड़ जेल में बिताने पड़े. उस पर दिल्ली के लाजपत नगर धमाके का आरोप था लेकिन दिल्ली हाइकोर्ट ने उसे बरी कर दिया. इसी तरह अब्दुल मजीद भट जो पहले श्रीनगर में आतंकियों के आत्मसमर्पण कराने में आर्मी की मदद करते थे, लेकिन किसी बात पर आर्मी इंटेलिजेंस में तैनात मेजर शर्मा से अनबन हो गई, उसके बाद मजीद पर मानो आफत आ पड़ी।

श्रीनगर में उसे पकड़वाने में नाकाम शर्मा ने दिल्ली पुलिस की मदद ली. दिल्ली पुलिस की टीम ने मजीद को श्रीनगर से उठाया, लेकिन उसे दिल्ली से गिरफ्तार बताया. लेकिन मजीद ने आरटीआइ के जरिए गाडिय़ों की लॉग बुक आदि मंगाई, जिससे पुलिस की थ्योरी गलत साबित हुई. मजीद इंडिया टुडे से कहते हैं, ‘‘देश और यहां की व्यवस्था खराब नहीं है, बल्कि पुलिस में कुछ लोग खराब हैं, जिनकी वजह से पूरा सिस्टम बदनाम होता है. हम पहले भी देश के लिए ही काम करते थे और आज भी कर रहे हैं.’’ साफ है कि पुलिस की ज्यादती का शिकार मुस्लिम समाज सबसे ज्यादा है।

इन मुसलमानों पर लगे कैसे-कैसे आरोप, लेकिन पुलिस आरोपपत्र नहीं पेश कर सकी :-

उमेर सिद्दीकी, 36 वर्ष :
सिमी का मुख्य व्यक्ति. इसने अब्दुल्ला उर्फ हैदर और मुजीब के साथ मिलकर बोधगया और पटना धमाके की योजना बनाई. सिमी के बड़े आतंकियों आमिल परवेज, सफदर नागौरी, करीमुद्दीन नागौरी, अब्दुल शोभान तौकीर और खंडवा जेल से फरार आतंकी अबु फैजल के साथ लगातार संपर्क रखना. इसके अलावा रायपुर में सिमी का कैंप लगाने, प्रशिक्षण देने और कश्मीर को भारत से अलग कराने, मुसलमानों पर अत्याचार का बदला लेने, लादेन के तौर-तरीकों को जिहाद के लिए अपनाने जैसे गंभीर आरोप में सीधी भूमिका होने के आरोप हैं.

अजहरुद्दीन कुरैशी, 19 वर्ष :
हैदर समेत कई आतंकियों को मकान दिलवाना, उमेर के पकड़े जाने पर उसे भगाना, शेर अली के साथ साझा बैंक खाता होना, बारूद/बंदूक की व्यवस्था करना. 18-19 साल के युवाओं का ग्रुप बना उसका लीडर बनने की कोशिश.

अब्दुल वाहिद, 55 वर्ष :
उमेर के साथ सिमी आतंकियों को शरण देने, सिमी के कैंप में शिरकत करने, खंडवा के आतंकी ईनाम के संबंधियों के साथ आतंकियों के बड़े कैंप में जाना और छत्तीसगढ़ आने वाले आतंकियों को अपने घर में ठहराने का आरोप.

रोशन उर्फ जावेद, 32 वर्ष :
अब्दुल वाहिद का दामाद. आतंकियों को शरण देने से लेकर सिमी के कैंप में जाने, सिमी के लिए मासिक चंदा उगाही करने जैसे आरोप हैं.

अब्दुल अजीज, 45 वर्ष :
बोधगया-पटना धमाके के आरोपी हैदर, नुमान, तौफीक, मुजीब को घर में शरण देने का आरोप है.

अजीजुल्लाह, 38 वर्ष :
गुजरात के सूरत से 2002 में सिमी के कैंप से गिरफ्तार किया गया था, जिस पर रिहा होने के बाद उमेर के साथ सिमी के कैंपों में जाने और आतंकियों को शरण देने का आरोप है.

हयात खान, 45 वर्ष :
राजू मिस्त्री के नाम से मशहूर है और रायपुर स्थित पंडरी में दो गैराज हैं. इसी गैराज में सिमी की बैठकें लेना, उमेर के साथ मिलकर कैंप में जाना. हयात खान के गैराज में ही उमेर की ओर से नरेंद्र मोदी को मारने के लिए किसी को खुद से सामने आने की अपील की गई थी.

मोइनुद्दीन, 37 वर्ष; शेख हबीबुल्लाह, 33 वर्ष; मो. दाऊद, 40 वर्ष; शेख शुभान, 50 वर्ष; असलम, 38 वर्ष; सईद, 54 वर्ष; अम्मार बिन वाहिद, 19 वर्ष; सलीम, 43 वर्ष और शेर अली, 20 वर्षः इन सभी पर लगभग एक जैसे आरोप हैं. जिनमें सिमी की बैठकों में जाना, आतंकियों को पनाह देना शामिल हैं. दाऊद पर छत्तीसगढ़ की अंबिकापुर रैली में बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को मारने के लिए तैयार होने का आरोप है. कुछ ने संदिग्धों को पटना-बोधगया ब्लास्ट के मुख्य आरोपी हैदर को विस्फोटक उपलब्ध कराया तो पेशे से सिविल इंजीनियर शेर अली का अजहरुद्दीन के साथ बैंक में संयुक्त खाता है. इस खाते के पैसे का इस्तेमाल आतंकियों के लिए बंदूक, बारूद आदि के इंतजाम के लिए हुआ।

कोई लौटा दे इनके बीते दिन :-
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करीब दो दर्जन से ज्यादा ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जिनमें मुस्लिम युवाओं को पुलिस ने फंसाया, लेकिन अदालत से बाइज्जत बरी :-

मजीद भट, 55 वर्ष :

जगह: श्रीनगर
मामलाः 6 साल जेल में बिताए. मेजर शर्मा से अनबन हुई. दिल्ली पुलिस ने श्रीनगर में उठाया, लेकिन गिरफ्तारी दिल्ली के पहाडग़ंज से दिखाई. आरटीआइ से सच सामने आया और बरी हो गए.

जावेद अहमद, 35 वर्ष


जगहः यूपी में रामपुर
मामलाः 11 साल जेल में बिताए. देशद्रोह का आरोप. पाक की मोबीना से प्यार हुआ. दोनों लेटर लिखते थे, नाम के पहले अक्षर को कोड बना रखा था. यूपी एसटीएफ ने जे और एम बनाकर जावेद को आतंकी बताया.

वासिफ हैदर :


जगहः कानपुर निवासी
मामलाः करीब 9 साल जेल में बिताए. देशद्रोह, दंगों के आरोप. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने काम से घर लौटे वासिफ को उठाया. तीन दिन की यातना के बाद पुलिस उसे खूंखार आतंकी बना चुकी थी.

नासिर हुसैन, 32 वर्ष


जगहः बिजनौर
मामलाः 7 साल जेल में गुजरे. हूजी का आतंकी और ट्रेन में विस्फोट का आरोप. यूपी एसटीएफ ने तब उठाया जब वह देहरादून में कन्स्ट्रक्शन सुपरवाइजर का काम कर रहा था.

मकबूल शाह :


जगहः श्रीनगर
मामलाः 14 साल जेल में बिताए. दिल्ली के 1996 के लाजपत नगर धमाके में पुलिस ने पकड़ा. मगर आरोप साबित न होने के बाद दिल्ली हाइकोर्ट ने मकबूल को बाइज्जत बरी कर दिया।

आमिर खान, 32 वर्ष


जगहः दिल्ली
मामलाः 14 साल बाद अदालत ने बाइज्जत बरी किया. 22 धमाकों का मास्टरमाइंड बता पुलिस ने गिरफ्तार किया. आमिर की बहन की शादी पाकिस्तान में हुई थी, उससे फोन पर बात करता था. यहीं से वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया. महज 18 साल की उम्र में जेल पहुंचा. आमिर का पूरा परिवार बिखर गया, पिता चल बसे, मां लकवाग्रस्त हो गई।

सबसे बड़ी परेशानी यह है कि पुलिस संदिग्धों को आतंकी बताकर मानो अदालत का काम भी खुद ही कर देती है. मीडिया भी पुलिस की बात को अंतिम सत्य की तरह प्रचारित करता है, लेकिन अदालत से बरी हुए पीड़ित के बारे में कुछ नहीं बताता. कुछ समय पहले सीपीएम के महासचिव प्रकाश करात ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को ऐसे 22 बेगुनाहों की सूची वाला ज्ञापन सौंपा था।

ऐसे मामलों के लिए काम करने वाली संस्था रिहाई मंच के प्रवक्ता राजीव यादव कहते हैं, ‘‘जयपुर-सीकर में हुई गिरफ्तारी के बाद एक माहौल बनाया गया कि ये लोग मोदी की हत्या करने वाले थे. जबकि कहीं से आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई.’’ उनके मुताबिक, ‘‘हौवा बनाने के पीछे इंटेलिजेंस एजेंसी होती है, जिसकी संसद के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है. अगर इसे संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जाए तो आतंकवाद पर होने वाली राजनीति खत्म हो सकती है।’’

यादव का मानना है कि ऐसे मामलों में गलत साबित होने वाले पुलिस वालों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए. हालांकि इस मामले में अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन वजाहत हबीबुल्ला बताते हैं कि हैदराबाद की अदालत में 22 बेगुनाहों के बरी होने के बाद जब उन्होंने तत्कालीन सीएम किरण रेड्डी से पुलिस पर कार्रवाई की मांग की, तो उन्होंने इससे पुलिस के अनुशासन पर खराब असर पडऩे की बात कहकर किनारा कर लिया।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के जनरल सेक्रेटरी महमूद मदनी कहते हैं, ‘‘जब कोई वारदात होती है तो पुलिस पर दबाव होता है और उस दबाव को कम करने के लिए वह गर्दन के नाप का फंदा तलाशती है. उसे इस तरह पेश किया जाता है कि मुलजिम को मुजरिम बताया जाता है, इतना ही नहीं, बार काउंसिलें प्रस्ताव पारित कर केस लडऩे से इनकार कर देती हैं, सामाजिक बहिष्कार हो जाता है. पुलिस के निकम्मेपन और कथित सभ्य समाज का जुल्म एक मासूम का जीवन बरबाद कर देता है.’’ कई बार संदिग्धों का केस लडऩे वाले वकीलों को धमकी मिलती है।

और जिस तरह से कल यह धर पकड़ हुई है, उस पर भी सवाल उठने लगे हैं, अब वक़्त आ गया है कि बड़ी मुस्लिम तंज़ीमों और आलिमों का आगे आकर और एकजुट इस ट्रेंड के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करना होगी, और इन सभी को यह मांग रखना होगी कि जो भी मुसलमान युवक संदेह के आधार पर पकडे जाएँ, उनके लिए फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट्स बनाए जाएँ, और जल्दी न्याय की व्यवस्था की जाए, यदि दोषी साबित होते हैं तो सज़ा दी जाएँ, यदि निर्दोष हैं तो छोड़ा जाए, और इस गलत गिरफ्तारियों और जांच आदि के लिए ज़िम्मेदार अधिकारीयों के खिलाफ भी कार्रवाही की जाये ताकि उनका पारिवारिक, शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन बर्बाद होने से बच सके।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और वेलफेयर पार्टी के एसक्‍यूआरटी इलियास ने ने दावा किया कि, 2014 में असामाजिक गतिविधि एक्‍ट के तहत गिरफ्तार 141 युवकों में से केवल 18 के खिलाफ चार्जशीट दायर हुई। बाकी के 123 निर्दोष साबित हुए। इनमें से भी अधिकांश को ऊपरी अदालतों ने रिहा किया। मुस्लिम युवकों को अंधाधुंध तरीके से आतंकी या आईएस समर्थक बताकर पकड़ा गया था।

अभी भी वक़्त है कि ऐसी गिरफ्तारियों पर नज़र रख कर निर्दोषों को न्याय दिलाने के लिए मुस्लिम तंज़ीमें और आलिम आगे आएं, क़ौम की रीढ़ टूटने से बचाएँ।