स्पेशल स्टोरी – वाया :  द गार्जियन.

द गार्जियन ने आज अपने ओपिनियन कालम में एक लेख प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है ‘Five more years of Narendra Modi will take India to a dark place ‘मोदी को और पांच मिले तो भारत अन्धकार की ओर चला जायेगा।

द गार्जियन के ओपिनियन कालम में लेखक कपिल कोमिरेड्डी ने लिखा है कि अगर नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनकी कट्टर संप्रदायवादी राजनीति लोकतंत्र की परिभाषा ही बदल देगी।

भारत का 2019 का लोकसभा चुनाव गणतंत्र के पर्व से कहीं अधिक था, भारतियों के जीवन का ये सबसे अहम् चुनाव भी कहा जा सकता है, देखा जाए तो 1991 के बाद से मोदी सरकार में सबसे अधिक ‘परिवर्तन’ देखने को मिले हैं, यह चुनाव, इस बात का भी एक जनमत संग्रह है कि क्या गणतंत्र ने अपने संस्थापक आदर्शों को बरकरार रखा है या नहीं, यदि मोदी एक और कार्यकाल जीतते हैं, जैसा कि एक्जिट पोल के अनुसार उन्हें आरामदायक बहुमत मिलने की खबरें हैं) तो यह देश संप्रदायवाद के उस स्थान पर पहुँच जायेगा जहां से वापसी असंभव होगी।

2014 में मोदी की हिंदूवादी पार्टी भाजपा ने बहुमत के साथ सत्ता संभाली। ये तीन दशक में पहला मौक़ा था जब एक राजनैतिक दल ने सरकार बनाई, नरेंद्र मोदी ने देश में हर साल 2 करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था, लेकिन आज जमीनी सच्चाई इससे काफी दूर नजर आती है, आज 20 सालों में बेरोजगारी दर सबसे ज्यादा है, रोज़गार गायब हैं।

मोदी ने युवा मतदाताओं को स्मार्ट सिटीज के सपने दिखाए थे, सिओल और सिंगापूर जैसे शहर और सड़कों के वायदे किये थे मगर ज़मीनी तौर पर कुछ नहीं हुआ, गंगा की सफाई के लिए बड़े बड़े वायदे किये थे, हुआ कुछ भी नहीं।

इससे भी बुरी बात यह है कि भारत को एक हिंदू राष्ट्र में परिवर्तित करने के लिए मोदी ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपंग बनाया, चुनाव आयोग जो कि 1952 से निष्ठापूर्वक चुनाव कराता आया है, उसकी विश्वसनीयता और निर्णय संदेह के दायरे में आ गए, चुनावों में मोदी द्वारा धार्मिक धृवीकरण के भाषणों पर चुनाव आयोग की निष्क्रियता निंदनीय है।

इसके साथ सेना का राजनीतिकरण किया गया और न्यायपालिका पर 1975 के बाद फिर से संकट मंडराने लगा, इससे पहले इंदिरा गाँधी ने 21 महीने इमरजेंसी लगाईं थी। बुद्धिजीवियों और उद्योगपतियों के एक समूह द्वारा मोदी को एक तकनीकी आधुनिकतावादी आइकॉन के रूप परोसा गया, गुजरात के एक हिंदू वर्चस्ववादी जिसने एक बार शरणार्थी शिविरों में रहने वाले मुसलमानों को “बच्चे पैदा करने वाले शिविर” के तौर पर परिभाषित किया था।

और पांच साल के बाद हमारे पास “न्यू इंडिया” की एक झलक जो मोदी ने पैदा की है वो उनके एजेंडो का ही प्रतिबिंब है, सांस्कृतिक रूप से शुष्क, बौद्धिक रूप से खाली, भावनात्मक रूप से उच्छृंखल; फ़र्ज़ी और घृणास्पद माहौल जहाँ धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ अत्याचार, धौंस और धमकिया ही हैं।

दुनिया के सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में मोदी के सत्ता में आने के बाद मुसलमानों को मॉब लिंचिंग में मारा गया है, भारत में सांप्रदायिक पूर्वाग्रह हमेशा से ही रहा है, मगर मोदी राज में हिन्दू राष्ट्रवादियों ने हिन्दू आतंक को खूब प्रचारित किया, मॉब लिंचिंग में जितने मुसलमान क़त्ल किये गए वो गुनाहगार नहीं थे, वो सब हिन्दू बहुसंख्यवाद का शिकार बने।

जहाँ भी हिन्दू मतदाताओं से बात होती है वो यही कहते हैं कि मोदी ने हमें निराश किया है मगर उन्होंने मुसलमानों को ठिकाने पर रखा है, मोदी ने लोगों का जीवन यापन तो नहीं सुधारा बल्कि इसके साथ उन्हें उन्माद में धकेल दिया है।

इस समय भारत की त्रासदी यह है कि जब वह अस्तित्वगत संकट का सामना कर रहा है, तो भाजपा के सामने कोई अखिल भारतीय विकल्प नहीं है, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस जिसने भारत को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से आज़ादी दिलाने के लिए नेतृत्व किया, आज पस्त हालत में है, यदि मोदी फिर से सफल हो जाते हैं तो ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ लोकतंत्र की आधिकारिक विचारधारा बन जाएगा।

(कपिल कोमिरेड्डी की मई 2019 में प्रकाशित ‘ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ़ द न्यू इंडिया’ से)