यह तस्वीर दुनिया के सबसे संघर्ष वाले क्षेत्र गाजा की है। यहां इजरायल के साथ संघर्ष में सैकड़ों लोगों को अपने हाथ-पैर गंवाने पड़े हैं। अब ऐसे बहुत से युवा फुटबॉल खेलकर जिंदगी का गोल बदल रहे हैं। ये खिलाड़ी बीते साल के आखिर में शुरू हुए ‘क्लचर्स क्लब’ का हिस्सा हैं। अब इनकी तादाद 100 से ज्यादा हो चुकी है। इन्होंने अपनी एक टीम भी बनाई है। यह गाजा की पहली दिव्यांग फुटबॉल टीम है।

साल भर के अंदर ही इस ‘क्लचर्स फुटबॉल क्लब’ की टीम ने कई कीर्तिमान रचे हैं। इस टीम को देश के बाहर रूस समेत कई यूरोपीय देशों में टूर्नामेंट में खेलने का मौका मिला है। कई खिताब भी हासिल किए हैं। अब यह टीम पैरालिंपिक खेलने की तैयारी में भी जुटी हुई है। अब यहां के लोग इसे ‘हीरोज का फुटबॉल क्लब’ कहते हैं। इस क्लब को अबु घलयून ने शुरू किया है। शुरू के पांच महीने में 16 लोग जुड़े, अब क्लब के पास 13 से 35 साल के 100 से ज्यादा सदस्य हैं।

उन्हीं से जानते हैं इस क्लब के बनने की कहानी :

मैं बीते साल के आखिर में यूरोपियन चैंपियनशिप में तुर्की और ब्रिटेन की विकलांग टीम को खेलते देख रहा था। उसी वक्त गाजा के युवाओं के लिए टीम बनाने का ख्याल आया। पर खेलने के लिए संसाधन जुटाना इतना आसान भी ना था। फिर हमें गाजा के एक पुनर्वास सेंटर का साथ मिला। इस सेंटर ने हमें फुटबॉल किट्स और खेलने के लिए एक मैदान मुहैया करा दिया। मैदान और किट्स मिल चुकी थी। अब चुनौती थी, युवाओं को क्लब के साथ जोड़ने की। हमारे लिए विकलांग लोगों को खेलने के लिए मनाना काफी मुश्किल भरा टास्क था। फिर हमने एक टीम बनाई। ये टीम युवाओं से मिलती थी और उन्हें समझाती थी कि फुटबॉल से उनकी जिंदगी बदल सकती है।

ये मुहिम काम आई। महज पांच महीने में ही क्लब से 16 लोग जुड़ गए। धीरे-धीरे लोग जुड़ते चलते गए। अब हमारे पास 13 से 35 साल के 100 से ज्यादा खिलाड़ी हैं। एक इंटरनेशनल टीम भी बन चुकी है। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए हर एक खिलाड़ी ने कड़ी मेहनत की है। रोजाना टीम के सदस्य तीन टाइम ट्रेनिंग करते हैं।

उन्हीं की इच्छाशक्ति के चलते क्लब को स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट्स में शिरकत करने का मौका मिला है और हम कामयाब भी हुए हैं। ये भागा-दौड़ी लगातार जारी है। वैसे जिंदगी भी फुटबॉल की ही तरह है, हर पल भागने वाली। फुटबॉल खेलने से हमें और हमारे साथियों को शांति मिलती है।

इसके अलावा सेहत भी सुधर रही है। पैर खोने वाले लोगों के लिए यह तो वरदान की तरह है। उनके लिए शरीर के ऊपरी हिस्से का वजन नियंत्रित रख पाना मुश्किल भरा होता है। वजन बढ़ने के साथ ही तकलीफें भी बढ़ती हैं। लेकिन कड़ी ट्रेनिंग के जरिए गाजा के ये खिलाड़ी खुद को सेहतमंद भी रख रहे हैं। -अबु घलयून, क्लब के फाउंडर

हीरोज का फुटबॉल क्लब :

टीम के दो गोलकीपर में से एक इस्लाम अमून हैं। 2014 के इजरायल-फिलीस्तीन संघर्ष में अमून ने अपना बांया हाथ खो दिया था। अमून कहते हैं, जब मैंने पहली बार इस क्लब के बारे में सुना। तुरंत मेरे दिमाग में आया कि क्या मैं भी इस क्लब का हिस्सा बन सकता हूं। फिर मैं इससे जुड़ गया। शुरू में काफी दिक्कतें आईं। लेकिन समय के सााथ मुझे अपनी जिंदगी का मकसद मिल गया। अब मैंने अपनी विकलांगता पर जीत पा ली है। यह महसूस करना किसी ट्रॉफी को उठाने जैसा ही है !

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