बंगाल में ध्वस्त मंदिर को फिर से बनाने के लिए मुसलमानों ने धन जुटाकर कराया निर्माण, मौलवी ने किया मंदिर का उद्घाटन।

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देश की मीडिया पिछले चार पांच सालों से दिन रात हिन्दू-मुस्लिम और मंदिर-मस्जिद के मुद्दे उठाकर एक तरफ़ा सुनियोजित एजेंडे पर काम करते हुए हिन्दू मुस्लिम के बीच दरार डालने का काम लगातार करती आई है, मगर ये मीडिया ये नहीं बताती कि देश में आज अधिकांश जगहों पर धार्मिक सद्भाव है, आज भी देश में कई जगह हिन्दू मुस्लिम एक दूसरे के धार्मिक स्थलों की देखभाल करते हैं।

गोदी मीडिया धार्मिक सौहार्द को तोड़ने वाली खबरे बहुत जल्दी बताता है मगर देश वासियों को आपस में जोड़ने वाली ख़बरों को गायब कर जाता है।

ऐसी ही एक खबर बंगाल से आयी है, Hindustan Times के अनुसार राज्य की राजधानी कोलकाता से लगभग 160 किलोमीटर दूर नानूर क्षेत्र के बसापुरा में सांप्रदायिक सौहार्द की एक मिसाल देखने को मिली है जहाँ पश्चिम बंगाल में जब राज्य काली पूजा का आयोजन हो रहा था, तब उसी रात बीरभूम जिले में स्थानीय मस्जिद के मौलवी नसीरुद्दीन मंडल ने देवी काली को समर्पित एक मंदिर का अपने हाथों से उद्घाटन किया।

मौलाना नसीरुद्दीन मंडल कहते हैं कि “मैंने हमेशा मस्जिदों और मदरसों का ही उद्घाटन किया है, लेकिन यह पहली बार है जब मैंने किसी हिंदू मंदिर का उद्घाटन किया है, मेरे लिए ये पूरी तरह से एक अलग एहसास है।”

बसापुरा में मुस्लिम समुदाय के सदस्यों ने गांव की सड़क को चौड़ा करने के लिए दो साल पहले ध्वस्त किए गए काली मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए न सिर्फ पैसा जुटाया बल्कि उन्होंने मंदिर को स्थानांतरित करने के लिए जमीन भी खरीदी।

एक स्थानीय निवासी निखिल भट्टाचार्य ने बताया कि “मंदिर को एक सड़क को चौड़ा करने के लिए ध्वस्त किया गया था, मंदिर लगभग 30 साल पुराना था और श्रद्धालु नियमित रूप से यहां आते थे।”

मंदिर के ध्वस्त होने के बाद, स्थानीय लोगों ने इसे नए स्थान पर फिर से बनाने की योजना बनाई। मंदिर को फिर से बनाने के लिए मुसलमान धन जुटाने के अभियान में शामिल हो गए और मंदिर निर्माण की लगत 10 लाख रुपये में से 7 लाख रुपये इकठ्ठे कर लिए, जो एक नई जगह पर मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए खर्च किये जाने थे।

मंदिर की पूजा समिति के अध्यक्ष सुनील साहा बताते हैं कि ““हमने स्थानीय लोगों के साथ मंदिर के पुनर्निर्माण के मुद्दे पर चर्चा की, जिनमें से अधिकांश मुस्लिम समुदाय से हैं, उन्होंने फंड इकट्ठा किया, मंदिर के लिए खर्च किए गए 10 लाख रुपये में से 7 लाख रुपये मुसलमानों द्वारा जुटाए गए।

सुनील साहा आएगी बताते हैं कि “अगर स्थानीय मुस्लिम हमारी मदद नहीं करते, तो मंदिर का पुनर्निर्माण और पूजा बिलकुल भी संभव नहीं थी। इसलिए हमने रविवार शाम को मंदिर का उद्घाटन करने के लिए मौलाना नसीरुद्दीन मंडल को आमंत्रित किया।

बीरभूम जिला परिषद में सड़क मामलों के आधिकारिक व प्रभारी करीम खान, जो इसी क्षेत्र से हैं, ने कहा “हम सब यहाँ शांति से एक साथ रहते हैं। हम एक-दूसरे के साथ खड़े हैं और यह हमारी संस्कृति है, हमने मंदिर के पुनर्निर्माण में एक छोटी भूमिका निभाई है।”

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के एक स्थानीय नेता ने भी इन प्रयासों की प्रशंसा की है, बीरभूम जिला इकाई के भाजपा उपाध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा “हम एक साथ रहने में विश्वास करते हैं और मज़हब की वजह से नहीं बंटे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल में ऐसी कई कुछ घटनाएं हुई हैं जहां एक समुदाय दूसरे समुदाय की मदद के लिए आगे आया। पिछले साल दिसंबर 2018 में, बीरभूम जिले के दुबराजपुर क्षेत्र में रहने वाले 58 वर्षीय मोहम्मद फारुख ने हिंदुओं के लिए श्मशान स्थापित करने के लिए भूमि दान की थी। मोहम्मद फारुख ने जो जमीन दी थी उसका बाजार मूल्य लगभग 10 लाख रुपये था।

2017 में, पश्चिम मिदनापुर जिले के खड़गपुर शहर की एक मुहर्रम समिति ने ताजिया का आयोजन नहीं करने का फैसला किया था और इसके बदले एक हिंदू कैंसर रोगी को अपने इलाज के लिए पैसे दिए थे।

उसी साल जब पूर्वी बर्दवान जिले के भटार क्षेत्र के सुवुर गाँव के मोहर्रम के एक ताजिया में कोई भी ढोल बजाने वाला नहीं था तब गाँव में दुर्गा पूजा में ढोल बजाने वालों ने ढोल बजाकर उस कमी को पूरा किया था।

नवंबर 2017 को ऐसी ही एक घटना में मुसलमानों ने पैसे इकठ्ठे कर मालदा जिले के खानपुर गांव में एक गरीब बेसहार हिंदू महिला की शादी कराई थी।

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