‘इस्लामोफोबिया’ शब्द 1996 में ब्रिटैन के रूनमेड ट्रस्ट द्वारा गठित Commission on British Muslims and Islamophobia (CBMI) की रिपोर्ट ‘Islamophobia: A Challenge for Us All’ इस्लामोफोबिया : हम सब के लिए एक चुनौती’ के बाद सार्वजानिक प्रयोग में आना शुरू हुआ, इस्लामोफोबिया का अर्थ है ‘इस्लाम के खिलाफ खौफ’, ये कमीशन और इसकी रिपोर्ट एक तरह से ब्रिटेन-अमरीकी और यहूदी दक्षिणपंथी संगठनों और इन्हे फंडिंग करने वालों का सुनियोजित षड्यंत्र था जो बाद में लगातार सफल होता गया, इस गिरोह ने पूरी दुनिया में मुसलमानों के खिलाफ खौफ पैदा करने के लिए इस ‘इस्लामॉफ़ोबिया’ को खूब प्रचारित किया।

इसके बाद ‘इस्लामोफोबिया’ बढ़ती राजनीतिक और पूंजीवादी महत्वकांक्षा का औज़ार भी बनता गया, और सलमान रुश्दी की “‘ द सैटेनिक वर्सेज पर अयातुल्ला खुमैनी ‘की धमकी ‘और अमरीका में टविन टावर्स पर 11 सितंबर के हमलों के बाद से इस्लामोफोबिया में तेज़ी से इज़ाफ़ा देखा गया।

2001 से लेकर 2009 के बीच इस ‘इस्लामोफोबिया’ प्रोपगंडे पर ही इस दक्षिणपंथी गिरोह ने लगभग 4 करोड़ 20 लाख डालर खर्च कर दिए थे, इतने बड़े खर्च का मतलब था कि दुनिया में इस्लाम के खिलाफ डर पैदा करने या मुसलमानों के खिलाफ नफरत फ़ैलाने में कोई कंजूसी नहीं की जाए।

9/11 हमलों के बाद अमरीका में इस्लामोफोबिया चरम पर था, और इसके साथ ही इसने विश्व में पांव पसारना शुरू किये, न सिर्फ अमेरिका बल्कि यूरोप के कई मुल्क इस इस नकारात्मक भेदभाव वाले लफ्ज़ इस्लामोफोबिया के बहाने मुसलमानो के धार्मिक अधिकारों पर पाबन्दी लगाने में जुट गए, जैसे कि फ़्रांस और बेल्जियम में बुर्क़े पर पाबंदी लगा देना, इसके पीछे कई वाहियात दलीलें दी गयीं हैं, उनका मानना है कि बुर्का बंधनमुक्त समाज की नीति के प्रतिकूल है।

इसके अलावा पोलैंड जर्मनी स्विट्जरलैंड ऑस्ट्रिया और ब्रिटेन में भी इस्लामोफोबिया तेज़ी से फैल रहा है यहाँ के लोग अपने देश में मुसलमानो को शक की नज़र से देखने लगे हैं, वास्तविकता यह है कि इस पूर्वाःग्रह के पीछे यहूदी लाबी जमकर सक्रिय है, और करोड़ों डालर इस इस्लामोफोबिया मुहीम पर खर्च किये जा रहे हैं।

इस्लाम के खिलाफ पैदा किये जाने वाले इस घृणित हव्वे को अब कई देश अपने अपने हिसाब से केश कराने में लगे हैं, यदि इंटरनेट को खंगाला जाए तो कई आश्चर्यजनक और काफी हद तक वितृष्णा पैदा करने वाले तथ्य सामने आते हैं। दक्षिणपंथी और मुस्लिम विरोधी संगठन इस हव्वे का अपनी अपनी योजनाओं के हिसाब से भुना रहे हैं, नार्वे में आंद्रे ब्रेविक द्वारा किया गया नर संहार जिसमें तक़रीबन 77 लोगों को उस अकेले ने मौत की घाट उतार दिया था, वजह थी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर मुस्लिम विरोधी साइटों से उसका जुड़ा रहना।

देखा जाए तो इसका उपयोग मुसलमानों के विरुद्ध पूर्वाग्रह के रुप में किया जाने लगा है, कई यूरोपीय मुल्क और अमरीका में इस्लामोफोबिया की सियासी फसल काटी जा रही है, सत्ताएं हासिल की जा रही हैं, ताज़ा उदाहरण डोनाल्ड ट्रम्प हैं जिन्हे इस्लामॉफ़ोबिक केम्पेन की वजह से ही सत्ता हासिल हुई है।

ऐसे हालात में मुसलमानों को क्या करना चाहिए ?
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अब वक़्त आ गया है कि दुनिया के मुसलमान इस धृणित प्रोपगंडे ‘इस्लामोफोबिया’ के खिलाफ एकजुट हो जाएँ, और इसको बे-असर करने, झूठा साबित करने के लिए आगे आयें, और गैर इस्लामी भाइयों को इस्लाम की खूबियों से वाक़िफ़ कराएं, नफरत के इस ज़हर को नफरत और जोश से कम नहीं किया जा सकता, मुसलमानों को अपना आत्मनिरीक्षण करने की भी ज़रुरत है।

कोशिश होनी चाहिए कि फौरी तौर पर अपने ही समाज में हिंसक और मज़हब की खूबियों से अनजान जाहिलों को समझाने, राह भटके लोगों को राह दिखाने के लिए जुट जाएँ। ये खासतौर से नज़रियाती (वैचारिक) तौर पर करना होगा, आखिरकार ये एक नज़रियाती जंग है, इन लोगों को अपने मज़हब को इस्लाम की जड़ में मठ्ठा डालने वाले मुस्लिम नामों, संगठनों और संस्थाओं की पहचान कर उन्हें अपने से अलग करने की कोशिश करनी चाहिए।

यही एक रास्ता है कि हमें इस्लाम की अमन और सद्भाव के धर्म और बहुलवाद वाले समाजों में सह-अस्तित्व की समझ को स्पष्ट और ज़ोरदार अंदाज़ में प्रचारित करना चाहिए। और इसमें क़ुरान करीम की आयतें और नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम (स.अ.व.) का किरदार हमारे लिए मददगार होगा।

इसी को मद्दे नज़र रखते हुए अमरीका और यूरोप के मुसलमान अब इस नज़रियाती जंग को नज़रिये से ही जीतने निकल पड़े हैं, वो लोग अपने मुल्कों में, शहरों में Visit My Mosque (मेरी मस्जिद में तशरीफ़ लाइए) जैसे केम्पेन चला रहे हैं, इसमें एक खास दिन जिसे ‘ओपन डे’ कहा जाता है, गैर मुस्लिमों के लिए मस्जिद के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं।

उन्हें नमाज़ से लेकर क़ुरआने पाक के बारे में बताया जाता है, इस्लामी नज़रिये, नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम (स.अ.व.) की जीवनी और शिक्षाओं के बारे में बताया जाता है, साथ ही आगंतुकों के मन में आये सवालों के जवाब दिए जाते हैं, उनके लिए चाय नाश्ते का भी इंतेज़ाम किया जाता है।

Visit My Mosque मुहीम को न सिर्फ दुनिया भर की मीडिया में जगह मिली है, बल्कि अब यूरोप और अमरीकी सियासी लोगों ने भी इस केम्पेन में शिरकत करना शुरू कर दिया है।

पूरी दुनिया के मुसलमान अगर इस नफरत की मुहीम ‘इस्लामोफोबिया’ के खिलाफ उठ खड़े हो जाए तो अमरीका और गिनती के यूरोपीय मुल्कों कि क्या मजाल कि इस नफ़रत के पौधे को आगे खाद पानी देने की हिम्मत करे।

(अगले भाग में इस ‘इस्लामोफोबिया’ प्रोपगंडे की फंडिंग पर)