कश्मीर में अपने घर में साजा बेगम रात का खाना बना रही थीं, तभी उनका बेटा आमिर फारूक रसोई घर में आया और बोलै “माँ, मुझे एक सांप ने काट लिया है, मैं मरने वाला हूँ।”

New York Times की खबर के अनुसार इस इमर्जेन्सी में साजा बेगम किसी भी एम्बुलेंस को नहीं बुला सकती थीं क्योंकि सरकार ने कश्मीर में मोबाइल सेवा बंद की हुई है, अपने बेटे की ज़िन्दगी बचाने और सांप के काटे की दवाई तलाशने के लिए उन्हें 16 घंटे की यात्रा करना पड़ेगी, ये सोचकर साजा बेगम सदमें में आ गई। कुछ देर बाद आमिर का पैर सूजने लगा और वो बेहोश हो गया।

सांप के काटने के अधिकांश मामले घातक होते हैं जब तक कि एक एंटीवेनम दवा और पॉलीवलेंट इंजेक्शन शुरूआती छह घंटों में उपलब्ध न हो।साजा बेगम ने अपने बेटे पैर के चारों ओर एक रस्सी बांधी इस उम्मीद से कि यह जहर को धीमा कर देगा। वह फिर अपने बेटे के साथ गाँव के सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंची जहाँ कि आमतौर पर सांप के काटे के इंजेक्शन उपलब्ध होते हैं, मगर वो बंद था।

साजा बेगम मदद के लिए चिल्लाई और बारामूला के जिला अस्पताल जाने के लिए सवारी की भीख मांगी। लेकिन जिला अस्पताल पहुँचने के बाद भी वहां मौजूद डॉक्टर मदद नहीं कर पाए, क्योंकि उन्हें एंटीवेनम नहीं मिल पाया, तब उन डॉक्टर्स ने आमिर को श्रीनगर के एक अस्पताल में ले जाने के लिए एम्बुलेंस की व्यवस्था की।

एम्बुलेंस में रवाना होने के बाद परिवार ने कहा कि सैनिकों ने एम्बुलेंस को रास्ते में कई बार रोका, आमिर की आँखें धीरे-धीरे बंद हो रही थीं, उसने अपनी माँ से दबी आवाज़ में कहा कि वह अपने दाहिने पैर को महसूस नहीं कर सकता। आमिर का परिवार जैसे तैसे आखिरकार श्रीनगर के सौरा अस्पताल पहुंचा तो पता चला कि अस्पताल में एंटीवेनम ही नहीं था।

आमिर के परिवार को पता नहीं था कि बारामूला में वो जिस स्वास्थ्य केंद्र गए थे वहां सांप के काटे के इंजेक्शन थे, मगर उस स्वास्थ्य केंद्र का क्लर्क वहां मौजूद नहीं था, और उससे संपर्क करने के लिए मोबाइल सेवा बंद थी।

श्रीनगर में आमिर का परिवार ने एंटीवेनम के लिए एक फ़ार्मेसी से दूसरी फ़ार्मेसी तक दौड़ते रहे मगर कुछ नहीं मिला, उसके बाद वो एक आर्मी कैंप के गेट पर पहुंचे जहाँ आमतौर पर एंटीवेनम का स्टॉक रहता था, लेकिन वहां से भी उन्हें अगले दिन आने के लिए कहा गया। 46 वर्षीय फारूक अहमद डार ने कहा कि उन्होंने अपने आप को कभी इतना असहाय महसूस नहीं किया। “मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी छाती में चाक़ू घोंप दिया हो।”


सांप के काटने के 16 घंटे बाद, अगले दिन सुबह 10:30 बजे आमिर डार की मौत हो गई। उसके माता-पिता ने उसके शरीर को लिए एम्बुलेंस में 55 मील की यात्रा की।

एंटीवेनम दो दिन बाद शहर के अस्पतालों में पहुंचा यह अन्य दवाओं के साथ एक वैन में 30 शीशियों में आया था।

कई कश्मीरी डॉक्टरों ने कहा कि नाकाबंदी के कारण दर्जनों रोके जा सकने वाली मौतें हो सकती हैं।

अगस्त के अंत में एक कश्मीरी डॉक्टर उमर सलीम को इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया था कि वो फोन और इंटरनेट सेवा बहाल करने के लिए आंदोलन किये हुए थे, उमर सलीम को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया था, बाद में पुलिस अधिकारियों ने उसे फिर से ऐसा न करने की चेतावनी के साथ कुछ घंटों के बाद जाने दिया था। डॉक्टर उमर सलीम का कहना है कि “हम एक औपचारिक तौर पर जेल में नहीं हैं, लेकिन यह भी किसी जेल से कम नहीं है।

भारत सरकार ने कश्मीर की स्वायत्तता को रद्द करने और कश्मीर घाटी में कठोर सुरक्षा उपायों को लागू करने के दो महीने बाद, डॉक्टरों और रोगियों का कहना है कि सरकार ने इंटरनेट बंद करने सहित सरकार द्वारा लगाए गए संचार ब्लैकआउट के कारण बड़े पैमाने पर कई लोगों की जान ले ली है।

मोबाइल सेवा के बिना कैंसर रोगी ऑनलाइन दवा खरीदने के आर्डर देने में असमर्थ रहे हैं, तो वहीँ डॉक्टर एक-दूसरे से बात नहीं कर सकते, ना ही विशेषज्ञों को ढूंढ सकते हैं या ज़िन्दगी और मौत से झूझते मरीज़ों की मदद के लिए महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। और क्योंकि अधिकांश कश्मीरी अपने घरों में लैंडलाइन नहीं रखते हैं, इसलिए वे मदद के लिए फोन नहीं कर सकते। बिना मोबाइल सेवा के सब कुछ ठप्प है।

कश्मीर के एक अस्पताल के डॉक्टर सादात ने कहा, “कम से कम एक दर्जन रोगियों की मौत हो गई है क्योंकि लोग मोबाइल सेवा नहीं होने की वजह से वक़्त पर एम्बुलेंस को कॉल नहीं कर सकते हैं या समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सकते हैं।” इनमें से अधिकांश ह्रदय रोगी थे।

इस लेख के लिए कई डॉक्टरों ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि उन्हें पत्रकारों के साथ बात करने के लिए नौकरी से निकाला जा सकता है। कश्मीरी डॉक्टरों ने भारतीय सुरक्षा बलों पर सीधे चिकित्सा कर्मियों को परेशान करने और डराने का आरोप लगाया है।

वहीँ भारतीय अधिकारियों ने उन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि प्रतिबंधों के तहत भी अस्पताल सामान्य रूप से काम कर रहे हैं, और स्वास्थ्य देखभाल कर्मचारियों और आपातकालीन रोगियों को चौकियों के माध्यम से यात्रा करने की अनुमति देने के लिए पास दिए गए हैं। एक सरकारी अधिकारी रोहित कंसल ने कहा, “प्रतिबंध से किसी तरह का जानमाल का नुकसान नहीं हुआ।” “हमने जान गंवाने से ज्यादा जान बचाई है।”

लेकिन अस्पताल के रिकॉर्ड के आधार पर और कई स्वास्थ्य अधिकारियों ने अनुमान लगाया है कि सैकड़ों मरीज़ एम्बुलेंस के बिना गंभीर स्थिति में होंगे, और कई लोगों की मौत संचार माध्यमों पर रोक की वजह से हुई होगी, हालांकि इसके कोई संकलित आंकड़े सरकार के पास नहीं हैं।

कश्मीर में ‘Save Heart Initiative’ नामक एक व्हाट्सएप ग्रुप है जिसने 13,000 से अधिक हृदय रोगियों की आपात स्थितियों में मदद की थी और इस ग्रुप की कहानी को भारतीय मीडिया ने कश्मीरी सफलता की कहानी के रूप में पेश किया था। सैकड़ों कश्मीरी डॉक्टर और यहां तक ​​कि अमेरिका के भी कुछ, डॉक्टर इस व्हाट्सएप ग्रुप का हिस्सा थे, ये सब मिलकर ह्रदय रोग सम्बन्धी जानकारियां और इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी ग्रुप मेंअपलोड करते थे और फिर एक दूसरे से रोगों पर सलाह करते थे। मगर अब कश्मीर घाटी में कोई इंटरनेट सेवा बंद होने से वहां के डॉक्टर इस ग्रुप का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं।

कश्मीर के सबसे बड़े शहर श्रीनगर के श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल में डॉक्टरों ने कहा कि प्रतिबंधों की वजह से पिछले दो महीनों में सर्जरी की संख्या में 50% गिरावट आई है, साथ ही दवा की कमी भी से भी जूझना पड़ा है।

कई युवा डॉक्टरों ने कहा कि मोबाइल फोन सेवा के बंद होने से उनके काम में विशेष रूप से बाधा उत्पन्न हुई है। जब उन्हें सीनियर डॉक्टरों से मदद की जरूरत पड़ी, तो उन्हें अस्पताल में घूमकर तलाशते हुए हुए कीमती समय गंवाना पड़ा।