सोमवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ऐलान किया कि उनकी पार्टी की सरकार बनी, तो देश के सबसे गरीब 5 करोड़ परिवारों को हर महीने 6000 रुपये तक दिए जाएंगे। ये घोषणा अचानक नहीं की गई है, बल्कि इसके पीछे अध्ययन और अर्थ शास्त्रियों की राय भी शामिल है।

‘न्यूनतम आय योजना’ नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के गरीबी ‘सूचकांक’ (Poverty Index) पर आधारित है, अमर्त्य सेन ने अपने इंडेक्स में गरीबों को तीन श्रेणियों में विभाजित था, ‘गरीबों के बीच बहुत गरीब’, ‘गरीब’ और ‘अन्य’।

अर्थ शास्त्री ज्यां द्रेज और अमर्त्य सेन के अलावा इस योजना के लिए नोबल पुरस्कार से सम्मानित ब्रिटिश अर्थशास्‍त्री एंगस डीटन और और फ्रेंच इकोनॉमिस्ट थॉमस पिकेटी का भी योगदान रहा है। ये दोनों अर्थ शास्त्री ‘असमानता की खाई को कैसे पाटा जाए’ मुद्दे पर काफी योजनाएं सामने रख चुके हैं।

फ्रेंच इकोनॉमिस्ट थॉमस पिकेटी ने अपनी किताब ‘Capital in the Twenty-First Century’ में उन तरीकों पर प्रकाश डाला है कि किस तरह से औद्योगिक क्रांति से पैदा हुई असमानता को कम किया जाए और कैसे कुछ धनाड्य परिवारों के कब्जे से पूंजी को निकालकर आम लोगों तक लाया जाए।

मूल रूप से ये योजना इस तरह काम करेगी कि अध्ययन में पाया गया कि 20 % यानि 5 करोड़ गरीब परिवारों को 12,000/- प्रतिमाह की ज़रुरत है, ऐसे में यदि किसी गरीब परिवार की आय 4000/- प्रतिमाह है तो कांग्रेस उसके खाते में 8000/- जमा करेगी।

यदि 3000/- है तो 9000/- जमा करेगी। इसके लिए बड़े स्तर पर सर्वे और आंकड़े इकठ्ठे करना होंगे, कांग्रेस पार्टी इसके लिए NSSO और CSO के आंकड़े की मदद लेगी। पहले यह स्कीम पायलट बेसिस पर चलाई जाएगी, उसके बाद इसे कई चरणों में लागू किया जाएगा।

इस योजना की घोषणा करने से पहले कांग्रेस ने मनमोहन सिंह, पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम की सदस्यता वाली एक कमिटी ने अध्ययन किया था, जिसके आधार पर यह स्कीम तैयार की गई। कमिटी ने इनकम डिस्ट्रीब्यूशन का विस्तार से अध्ययन किया। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों से सलाह ली गई।

न्यूनतम आय योजना या मिनिमम इनकम गारंटी योजना विश्व के कई देशों में सफलतापूर्वक अपनाई जा रही है, इसमें फ़िनलैंड, ब्राज़ील, डेनमार्क, फिनलैंड, जर्मनी, आयरलैंड और कनाडा शामिल हैं। कनाडा में 2017 में 4000 परिवारों को इस योजना का लाभ दिया गया था। ब्राज़ील में ये योजना इस शर्त पर लागू की गयी थी कि इस योजना का लाभ लेने वाले परिवार अपने बच्चों को स्कूल ज़रूर भेजेंगे।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और ऑक्सफोर्ड गरीबी और मानव विकास पहल (ओपीएचआई) द्वारा संयुक्त रूप से तैयार 2018 बहुआयामी वैश्विक गरीबी सूचकांक (MPI) रिपोर्ट को देखें तो भुखमरी दूर करने में मोदी सरकार मनमोहन सरकार से काफी पीछे है, 5 साल में वैश्विक गरीबी सूचकांक में भारत की रैंकिंग 55 से गिरकर 103 पर पहुंच गई है। भारत में अब भी 28 फीसदी लोग गरीबी में जी रहे हैं।

मोदी सरकार के आने के बाद भारत कई मौलिक वैश्विक सूचकांकों जैसे वैश्विक भूख सूचकांक (Global Hunger Index) में 119 देशों की सूची में 103वें नंबर जा पहुंचा है, इस ग्लोबल हंगर इंडेक्स – 2018 में भारत की स्थिति नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से भी खराब है। तो वहीं मानव विकास सूचकांक (Human Development Index) की 189 देशों की सूची में 130वें नंबर पर आ गया है। इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में भारत 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर है, जो देश के लोगों के औसत जीवन स्तर को बयान करता है।

 

2014 से साल दर साल गिर रही है GHI में भारत की रैंकिंग :-
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वर्ष        भारत की रैंकिंग
2014 –  55
2015 –  80
2016 –  97
2017 –  100
2018 –  103

GHI-2018 में भारत के पड़ोसी देशों की स्थिति :
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चीन  – 25
श्रीलंका  – 67
म्यामांर  – 68
नेपाल  – 72
बांग्लादेश  – 86
मलेशिया  – 57
थाईलैंड  – 44
पाकिस्तान – 106

स्त्रोत :  GLOBAL HUNGER INDEX

यदि कांग्रेस प्रतिबद्धता और सुचारू रूप से इस योजना के लिए कार्य योजना बनाती है तो इसमें कोई संदेह नहीं कि न सिर्फ ये योजना सफल हो सकती है बल्कि देश में गरीबों की स्थिति में सुधर आ सकता है, और वैश्विक गरीबी सूचकांक में मोदी सरकार के दौरान गिर चुकी भारत की रैंकिंग 103 से फिर सुधर कर 55 या उससे कम तक आ सकती है। साथ ही वैश्विक भूख सूचकांक और मानव विकास सूचकांक में भी स्थिति सुधर सकती है इसकी आशा है।