शाहीन बाग़ में भी हैं कई शाहीन बाग़।

स्पेशल स्टोरी वाया : Qaumi Awaz 

शाहीन बाग की चर्चा पूरी दुनिया में है और देश के कई शहरों में कई ‘शाहीन बाग़’ बन चुके हैं। लेकिन खुद दिल्ली के शाहीन बाग़ में जहाँ CAA और NRC के खिलाफ प्रोटेस्ट हो रहे हैं, कई छोटे छोटे शाहीन बाग़ नज़र आते हैं।

शाहीन बाग मेट्रो स्टेशन से उतरते ही प्रदर्शन स्थल तक पहुँचने के लिए ‘ई-रिक्शा’ में बैठने के दौरान ही शाहीन बाग़ प्रोटेस्ट का महत्त्व समझ आ गया। ई-रिक्शा में पहले से ही दो महिलाएं बैठी थीं जो प्रदर्शन में शामिल होने जा रही थीं। वो आपस में इस बात पर चर्चा कर रही थीं कि कैसे विरोध प्रदर्शन के लिए वक़्त निकाल पाती हैं, घर की चाबी किसे देकर आईं हैं, क्या खाना पकाकर आईं हैं।

लेकिन उनकी बातचीत से ये साफ़ था कि दोनों को नागरिकता संशोधन अधिनियम, एनआरसी के बारे में आवश्यक जानकारी थी और वह प्रदर्शन के उद्देश्य से अच्छी तरह से परिचित थीं। प्रधानमंत्री मोदी और मीडिया के खिलाफ उनका गुस्सा उनकी बातों में झलकता था। वह इस बात से भी नाराज़ थीं कि मीडिया में यह झूठी खबर फैलाई जा रही है कि विरोध करने आने वाली महिलाओं को प्रति महिला 500 ​​रुपये का भुगतान किया जा रहा है।

ई-रिक्शा चालक इस बात से तो खुश था कि उसका काम बढ़ गया था लेकिन वह ट्रैफिक जाम को लेकर परेशान था। कई जगहों पर तीन या चार मिनट के ट्रैफिक जाम के बाद, ई रिक्शा वाले ने हमें विरोध प्रदर्शन स्थल के पास उतार दिया। गली से विरोध स्थल तक पहुँचने पर बड़ी भीड़ ने स्वागत किया। जहाँ तंबू के नीचे कई महिलाएँ मोर्चे पर बैठी थीं और पीछे मौजूद नौजवान आजादी के नारे लगा रहे थे।

प्रदर्शन स्थल के दाईं ओर कुछ सीढ़ियां चढ़ने के बाद बंद दुकानों के सामने कुछ बच्चे पेंटिंग करने और सीखने में व्यस्त दिखाई दिए। वहां प्रभारी के रूप में काम कर रही एक लड़की, जो पीएचडी अंग्रेजी की छात्रा है, बच्चों को कागज और रंग दे रही थी। वह बच्चों की पेंटिंग को लेकर उन्हें प्रोत्साहित करती भी देखी गई। उस छात्रा के अनुसार, “प्रदर्शन पर आने वाली महिलाएं अपने बच्चों को साथ लाने के लिए बाध्य हैं क्योंकि वे बच्चों को घर पर अकेले नहीं छोड़ सकतीं हैं। इसलिए हम इन बच्चों को यहाँ किसी न किसी तरह से व्यस्त रखने की कोशिश करते हैं। ये बच्चे यहां पेंटिंग में बहुत रुचि रखते हैं।

दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों ने शाहीन बाग के DTC बस स्टॉप को एक लाइब्रेरी में बदल दिया है, जहां कई किताबें रखी गई हैं, जहां युवा अपनी रूचि की किताबें पढ़ने में व्यस्त हैं। जिन बच्चों को अंदर बैठने की जगह नहीं मिल रही है वे बाहर खड़े होकर किताबें पढ़ने में व्यस्त नज़र आते हैं।

थोड़ा आगे जाने पर पचास साठ नौजवानों का एक ग्रुप नारे लगाता नज़र आया। इसके आगे में इंडिया गेट का एक मॉडल बनाया गया है जिस पर उन लोगों के नाम लिखे हुए हैं जो नागरिक संशोधन कानून के विरोध प्रदर्शनों में मारे जा चुके हैं। इसके आगे एक और ग्रुप आज़ादी के नारे लगाता हुआ नज़र आया, जो बीच बीच में मोदी और अमित शाह के खिलाफ भी नारे लगा रहा था।

वहीँ पर भारत का एक बड़ा नक्शा लगा हुआ है, जिसकी एक तरफ हिंदी में और दूसरी तरफ अंग्रेजी में लिखा है, “हम CAA और NRC को अस्वीकार करते हैं।” पास ही एक प्रतीकात्मक डिटेंशन केम्प बनाया हुआ है।

 

तीन स्थानों पर लोगों को राष्ट्रीय झंडे को हाथों में लेकर तस्वीरें लेते हुए देखा जा सकता है, भारत के नक्शे के सामने, इंडिया गेट के मॉडल के सामने और प्रतीकात्मक डिटेंशन केम्प के अंदर। स्टेज के पीछे जहां दूर से आने वाले प्रदर्शनकारियों के लिए नाश्ते का सामान दिखाई देता है, साथ ही में यहाँ एक नि: शुल्क चिकित्सा केंद्र भी मौजूद है जहाँ ज़रुरत पड़ने पर मेडिकल सुविधा दी जा सकती है।

शाहीन बाग, जो CAA (नागरिकता संशोधन अधिनियम) और NRC के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का केंद्र बन चुका है, और इसी की तर्ज़ पर पूरे भारत में जगह जगह शाहीन बनते नज़र आ रहे हैं। वहीँ शाहीन बाग़ में जिसे महसूस होता है कि खुद शाहीन बाग़ में कई शाहीन बाग़ मौजूद हैं। क्योंकि ऐसा इसलिए है क्योंकि थोड़ी थोड़ी दूरी पर लोग अपने अपने तरीके से विरोध प्रदर्शन करते नज़र आते हैं।

इससे जहाँ कई नौजवानों के पूरे व्यक्तित्व को बदल दिया है और मंच पर आने के उनके डर को खत्म कर दिया है। और यह विरोध प्रदर्शन उनके लिए व्यक्तिगत विकास (Personality Development) के लिए एक अहम् रोल निभा रहा है, जहां छोटे व्यवसाय फलफूल रहे हैं। इसी जगह पर जहाँ चाय, मूंगफली, रेवड़ी, उबले अंडे, पूरी कचौरी के ठेले लगे हुए हैं, वहाँ आसपास की सड़कों पर चाय की दुकानों पर और जगह जगह सर्दी के कपड़ों के विक्रेताओं की दुकानों के बाहर भीड़ नज़र आएगी।

जो भी हो शाहीन बाग़ में इस गणतंत्र दिवस के मौके पर आज़ादी और प्रजातंत्र का ज़्यादा अहसास हुआ क्योंकि ये आज़ादी और इस प्रजातंत्र का संविधान ही है जिसने यहाँ सरकार के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने का अधिकार दिया।

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