साल 1977 JNU के इतिहास में एक माइल स्टोन की तरह है जब जेएनयू के छात्रों ने आयरन लेडी इंदिरा गाँधी को JNU कुलपति पद से इस्तीफ़ा देने को मजबूर कर दिया था।

India Resist के लिए लिखे एक लेख में प्रोफ़ेसर चमन लाल लिखते हैं कि ‘बात 1977 की है जब आज के भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेता सीताराम येचुरी जेएनयू छात्र संघ (JNUSU) के अध्यक्ष हुआ करते थे, 5 सितम्बर 1977 को उन्होंने आंदोलन चलाकर इंदिरा गाँधी को JNU के चांसलर के उस पद से इस्तीफ़ा देने को मजबूर कर दिया था, जिस पर वो 1977 के चुनाव हारने के बाद भी क़ाबिज़ थीं।’

इससे पहले आंदोलनरत JNU छात्रों ने डॉ.बी.डी. नागचौधरी को उप कुलपति के पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया था, इसके बाद सीताराम येचुरी के नेतृत्व में प्रदर्शनकारी छात्र दोपहर में जेएनयू कैंपस से इंदिरा गांधी के निवास तक पहुंचे थे। वहां उन सबने “आपातकाल के अपराधियों” जैसे नारे लगाकर जोरदार नारेबाजी की, 10-15 मिनट के बाद इंदिरा गांधी अपने आपातकालीन समय के गृह मंत्री ओम मेहता और दो अन्य के साथ गेट तक तेजी से चलकर छात्रों से मिलने आईं थीं।

मुझे कहना चाहिए कि मैं इंदिरा गाँधी के व्यवहार से प्रभावित था लेकिन सुखद और शांत दिखने वाले उनके व्यक्तित्व से भी प्रभावित था। वो मुस्कुरा रही थी और छात्रों के नारे सुन रही थीं। फिर, सीताराम येचुरी ने जेएनयू छात्र संघ की मांगों को पढ़ना शुरू किया। उन्होंने इसे बहुत ही प्रभावी शैली में पढ़ा, जिसके लिए उन्हें त्रुटिहीन अंग्रेजी के लिए जाना जाता है। पहले पैराग्राफ में उन्होंने विस्तार से आपातकाल के दौरान लोगों के खिलाफ उनकी सरकार के अपराधों को सूचीबद्ध किया था।

कुछ देर के बाद उनकी मुस्कुराहट गायब हो गई, उन्होंने पूरी तरह से सीतराम येचुरी के ज्ञापन को भी नहीं सुना और चेहरे पर नाराज़गी लिए जिस तेज़ी से वो आईं थीं उसी तेज़ी से अपने चार मंत्रियों के साथ अपने निवास पर वापस चली गयीं। मगर उनके निवास स्थान के बाहर सीतराम येचुरी के नेतृत्व में छात्रों की नारेबाजी और भाषण जारी रहा।

कुछ देर बाद आंदोलनकारी छात्र अपना ज्ञापन वहीँ छोड़ कर वापस लौट आये और अगले दिन इंदिरा गाँधी ने जेएनयू के कुलपति के पद से इस्तीफा दे दिया।