विश्व में जहाँ अमरीकी और इज़राईली गठबंधन द्वारा मुस्लिम विरोधी मुहीम इस्लामोफोबिया को करोड़ों डॉलर्स फंडिंग कर फलीभूत किया जा रहा था वहीँ साथ में कद्दावर मुस्लिम राष्ट्राध्यक्षों के तख्ता पलट के लिए अरब क्रांति/जास्मीन क्रांति के एजेंडे को भी भारी भरकम फंडिंग कर मिडल ईस्ट में पेवस्त किया जा रहा था, और बाक़ी बची कमी को पूरा करने के लिए आइसिस को भी पैदा किया गया।

इससे दोहरे फायदे हुए, सद्दाम हुसैन से लेकर होस्नी मुबारक तक और ट्यूनीसिया के बेन अली से लेकर कर्नल गद्दाफी जैसी कद्दावर शख्शियतों को सत्ता छोड़नी पड़ी, अपनी ज़िन्दगियों से हाथ धोना पड़ा, अमरीकी-यहूदी लॉबी ने तेल पर क़ब्ज़ा कर लिया, जितना इन्वेस्ट किया था उससे सौ गुना हासिल कर रहे हैं।

इराक पर हमला करने के लिए दुनिया में दो लोग सबसे ज़्यादा उतावले थे, एक तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बुश और दूसरे उपराष्ट्रपति डिक चेनी, आप सुन कर हैरान रह जायेंगे कि ईराक़ पर हमले के समय तत्कालीन अमरीकी उपराष्ट्रपति डिक चेनी की कंपनी Halliburton ने तेल के कुंओं के ठेके लिए हुए हैं यहाँ  विस्तार से पढ़िए।

और साथ ही तत्कालीन राष्ट्रपति बुश परिवार की कंपनी Carlyle Group भी इराक से रोकड़ा कूट रही है, यहाँ  विस्तार से पढ़िए।

और एक ख़ास बात क़ि जिसका डर दिखा कर इराक पर युद्ध थोपा गया और लाखों लोग मार दिये गए, अब उसी देश की रिपोर्ट कह रही है कि उस डर का कोई औचित्य नहीं था। सद्दाम के पास रसायनिक हथियार होने की बात गलत थी। ये युद्ध ज़बरदस्ती थोपा गया था।

आज इराक के लोग सद्दाम हुसैन को और उस दौर को याद करके पछताते होंगे, और मिस्र. लीबिया के लोग उस दिन को कोस रहे हैं जब वो अपने शासकों के खिलाफ अरब क्रांति/जास्मीन क्रांति की लौ जलाने के लिए सड़कों पर निकले थे।