विश्व में सभी धर्मों में पवित्र धार्मिक पुस्तकों का आदर और सम्मान किया जाता है चाहे वो कितने ही पुराने हों। उनकी सार संभाल और संरक्षण भी सम्मान के साथ ही किया जाता है। ठीक ऐसा ही इस्लाम में पवित्र क़ुरआन के लिए भी है।

पाकिस्तान के क्वेटा में दो भाइयों ने बोसीदा (जीर्ण शीर्ण) या बहुत पुराने होने की वजह से पढ़ने के लायक न रहने वाले क़ुरआन शरीफ की सार संभाल और उन्हें बेहुरमती से बचाने और संरक्षित करने के लिए एक शानदार और अनोखी पहल की है।

इसका मूल विचार 77 वर्षीय व्यापारी अब्दुल समद लहरी का था जिन्होंने एक बार एक दोस्त की कार के फर्श पर काबा शरीफ के फोटो वाले अख़बार को देखा था, उसी दिन से लहरी ने तय कर लिया था कि वो इस तरह के धार्मिक प्रतीकों और आयतों के सम्मान के लिए कुछ ज़रूर करेंगे।

लहरी के भाई ने पहाड़ी पर क्रेशर का ठेका लिया हुआ था, लहरी ने देखा कि वो इतने बड़े पहाड़ के छोटे से हिस्से को ही काम में ले रहे थे, उन्हें विचार आया कि क्यों न इस पहाड़ी के नीचे सुरंग बनाकर पुराने क़ुरआने पाक को एहतराम के साथ रखा जाए। दोनों भाई इस विचार को अमलीजामा पहनने में जुट गए और आखिर में लगभग 1992 में उन्होंने इसे हकीकत में बदल दिया।

और उन्होंने इसका नाम रखा जबल-ए-नूर यानी रौशनी का पहाड़, ये जबल-ए-नूर दर असल सऊदी अरब में काबा शरीफ से 2 मील दूर है इसे ग़ार-ए-हिरा भी कहा जाता है, जहाँ अल्लाह के रसूल मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम (ﷺ) पर पहली वही नाजिल हुई थी।

अब्दुल समद लहरी ने उस पहाड़ी में अंडर ग्राउंड सुरंगें बनाकर लगभग 50 लाख पुराने क़ुरआन शरीफों को एहतराम के साथ संरक्षित किया है। और जो दुर्लभ हैं उन्हें जनता को देखने के लिए म्यूज़ियम की तरह शो केस में रखा गया है। इसमें कुछ प्रतियां 600 साल पुरानी हैं।

इस अंडरग्राउंड सुरंगों की लम्बाई लगभग 5 किलोमीटर से ज़्यादा हो चुकी है। जनता के लिए ये क़ुरआन म्यूज़ियम है, और इसी लिए ये आकर्षण और आस्था के केंद्र भी बन गया है, रोज़ हज़ारों लोग इन सुरंगों को देखने और इबादत करने आते हैं, इनसे कोई शुल्क नहीं लिया जाता।

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