सनकी तानाशाह ईदी अमीन जिसने 60 हज़ार एशियाई मूल के लोगों को देश से निकालने के आदेश दिए थे।

युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन को दुनिया आज भी एक दुःस्वप्न की तरह याद करती है, ईदी अमीन ने 1971 से 1979 तक युगांडा पर राज किया था, ये शासनकाल युगांडा के इतिहास के काले अध्याय के रूप में दर्ज है। ईदी अमीन ने 4 अगस्त 1972 को उन 60,000 एशियाई लोगों के निष्कासन का फरमान जारी किया था जो युगांडा के नागरिक नहीं थे (इनमें ज़्यादातर गुजराती थे) उनकी सम्पत्तियाँ ज़ब्त कर ली गयीं थी।

ईदी अमीन के शासनकाल से पहले यानी 1970 के दशक में युगांडा को ‘पर्ल ऑफ अफ्रीका’ कहा जाता था। 1966 से युगांडा सेना और एयर फोर्स के मुखिया रहे ईदी अमीन ने 1971 में मिल्टन ओबोटे को सत्ता से बेदखल कर यहां की सत्ता अपने कब्जे में ले ली थी। सत्ता हथियाने के एक सप्ताह बाद फरवरी 1971 में अमीन ने खुद को युगांडा का राष्ट्रपति, सभी सशस्त्र बलों का प्रमुख कमांडर, आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ और चीफ ऑफ एयर स्टाफ घोषित कर दिया था।

ईदी अमीन ने सत्ता हासिल करते ही अपने विरोधियों, ओबाटे समर्थकों पर ज़ुल्म और अछोली जातीय समूहों के सफाये के लिए एक जनजातीय नरसंहार कार्यक्रम शुरू कर दिया।

ईदी अमीन ने 1972 में आदेश दिया कि जिन एशियाई लोगों को पास युगांडा की नागरिकता नहीं है, वो देश छोड़ दें। इसके बाद करीब 60 हजार भारतीयों और पाकिस्तानियों को देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। जब ईदी अमीन ने एशियाई मूल के लोगों को देश से बाहर निकाल फेंकने का एलान किया तो उसे उस समय उसके इस निर्णय पर देश में भारी जनसमर्थन मिला था।

ईदी अमीन के सत्ता में आने के बाद पूरा देश गृहयुद्ध की आग में झुलस गया था, देश की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गयी थी, 1970 से पहले जहाँ युगांडा में 1 £ (पाउंड) की कीमत 20 Ugandan Shilling थी वो 1979 तक 700 Ugandan Shilling तक पहुंच गई थी। इसकी वजह थी युगांडा से एशियन लोगों का देश निकाले के आदेश जिसकी वजह से वहां सैकड़ों फैक्ट्रियां बंद हो गईं और हजारों बेरोजगार हो गए थे। एशियन लोगों का देश निकाले के आदेश के बाद कई देशों ने युगांडा पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे, जिसके चलते देश में भुखमरी के हालात पैदा हो गए थे।

ईदी अमीन ने खुद को राष्ट्रपति घोषित करने के बाद राजनैतिक विरोधियों की हत्याएं कराईं, 1972 के प्रारंभ में लगभग 5000 अछोली व लांगो सैनिक तथा इससे कम से कम दुगुनी तादाद में नागरिक गायब हो गए। ईदी अमीन के निशाने पर विरोधी जातीय समूह, धार्मिक नेता, पत्रकार, कलाकार, वरिष्ठ नौकरशाह, न्यायधीश, वकील, छात्र एवं बुद्धिजीवी, बाहरी देशों के लोग शामिल थे।

विरोध को कुचलने के लिए यूनिवर्सिटी में सियासी डिबेट पर रोक लगा दी थी, छात्रों ने इसका विरोध किया तो अमीन ने उन्हें डराने के लिए यूनिवर्सिटी में सेना की टुकड़ी भेज दी थी।

ईदी अमीन एशियाई लोगों को देश का सबसे बड़ा दुश्मन मानता था, उसने एशियाई लोगों को देश छोड़ने के लिए इन्हें सिर्फ 90 दिनों का समय दिया था।

उन लोगें को यह भी धमकी दी थी कि अगर 8 नवंबर 1972 में के बाद कोई भी एशियाई युगांडा में नजर आया तो उसे जेल में डाल दिया जाएगा। ईदी अमीन ने जब एशियाइयों को देश से निकल जाने का आदेश दिया तो ये भी आदेश दिया था कि यूगांडा से जाने वाले एशियाई अपने केवल दो सूटकेस और 55 पाउंड की रक़म ही ले जा सकते हैं।

अपने घर, प्रॉपर्टी छोड़कर भाग रहे एशियाई लोगों को भी नहीं बख्शा गया, ईदी अमीन के सैनिकों द्वारा एयरपोर्ट पर तलाशी के नाम पर लोगों से ये करंसी भी छीनी जा रही थी।

देश के हालात इतने खतरनाक होते जा रहे थे कि लोग इस समय सिर्फ यही सोच रहे थे कि किसी तरह वे सही सलामत देश से बाहर निकल जाएं। ईदी अमीन ने नौ सालों तक युगांडा पर राज किया, इस दौरान देश में जमकर विरोधियों का दमन, जातीय सफाये, उत्पीड़न और गैरकानूनी हत्याएं हुईं। देश में मानवाधिकारों का जमकर हनन हुआ था, और भ्रष्टाचार, आर्थिक लूट का भी जबरदस्त सिलसिला चला। ये माना जाता है कि ईदी अमीन के शासनकाल में देशभर में पांच लाख लोग मार डाले गए।

1979 में जब तंजानिया और अमीन विरोधी युगांडा सेना ने धावा बोला, तब अमीन की नो साल की तानाशाही का अंत हुआ। ईदी अमीन ने यूगांडा छोड़ने के बाद कुछ समय लीबिया में शरण ली, ईदी अमीन 1980 तक लीबिया में रहा, उसके बाद वो सऊदी अरब में बस गया, जहां 2003 में उसकी मौत हो गई थी।

मगर ईदी अमीन के ने जब तक देश छोड़ा तब तक उसके सनक भरे निर्णयों और अत्याचारों के चलते कभी ‘पर्ल ऑफ अफ्रीका’ कहे जाने वाले देश युगांडा की हालत दयनीय हो चुकी थी, गृहयुद्ध की आग में झुलसे युगांडा की ध्वस्त आर्थिक स्थिति और अर्थव्यवस्था के साथ मुद्रा स्फीति चरम पर थी, यूगांडा से एशियन लोगों को (विशेषकर भारतियों को) देश निकाले का खामियाज़ा दशकों तक युगांडा को भुगतना पड़ा था। यही वजह थी कि एक साल पहले युगांडा के प्रेसिडेंट योवेरी मुसेवेनी ने कहा कि ईदी अमीन द्वारा भारतीयों को देश से निकालना बड़ी भूल थी।

(स्त्रोत : विकिपीडिया, BBC, The Times UK)

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